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अजमेर दरगाह के मालिक कुख्यात चिश्ती खानदान
के कारण होता रहा बच्चियों -महिलाओं का अपहरण

वर्ष 1992 से चल रहा राजस्थान का कुख्यात सामूहिक बलात्कार वाला यह मामला, जिसे ‘अजमेर ब्लैकमेल कांड’ कहा जाता है, आज भी एक खुला घाव है, जो उसके पीड़ितों के दर्द के किसी भी तरह के इलाज या फिर इस मामले के खत्म होने के प्रयासों का विरोध करता रहता है। वर्ष 2004 में सामने आये दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) के ‘एमएमएस कांड‘ से बहुत पहले हुआ यह कांड कई सारी युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार और वीडियो रिकॉर्डिंग तथा तस्वीरों के माध्यम उन्हें अपने आप को उनके हवाले करने और चुप्पी साधे रखने के लिए ब्लैकमेल करने का मामला था ,जिसका कुख्यात अपराधी वही चिश्ती परिवार है जो अजमेर दरगाह का मालिक है।

राजेश झा

अजमेर गैंगरेप और ब्लैकमेल का मामला राजनीतिक संरक्षण, धार्मिक पहुंच,न्यायालयीन दण्ड की अवहेलना और छोटे शहर के ग्लैमर के जहरीले मिश्रण से उपजा एक षड्यंत्र है। अजमेर दरगाह के प्रबंधक और उस मजार के मालिक चिश्ती परिवार ने वर्षों तक हिन्दू बच्चियों -युवतियों -महिलाओं को ब्लैकमेल कर उनका सामूहिक बलात्कार किया। यह मामला जिला अदालत से राजस्थान उच्च न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट, महिला अत्याचार न्यायालय में घूमते हुए और फ़िलहाल अजमेर की पॉक्सो अदालत में है। सितंबर 1992 में मुकदमा शुरू होने के बाद से, पुलिस ने छह आरोपपत्र दायर किए हैं, जिनमें 18 आरोपियों (शुरुआत में आठ से बढ़ाकर) और 145 से अधिक गवाहों का नाम है।यह मामला राजस्थान में 12 सरकारी अभियोजकों, 30 से अधिक एसएचओ, दर्जनों एसपी, डीआईजी, डीजीपी और पांच बार सरकार में बदलाव तक फैला हुआ है। अजमेर पुलिस को हमेशा से संदेह था कि इस मांमले में 100 से अधिक किशोरियों का शोषण किया गया , लेकिन प्राथमिक जांच के दौरान केवल 17 पीड़िताओं ने ही अपने बयान दर्ज किए।


यह कलंकित गाथा सामने नहीं आती यदि अजमेर का निडर क्राइम रिपोर्टर (आपराधिक मामलों का संवाददाता) सामने नहीं आया होता। यह दर्दनाक काण्ड कभी भी न्यायालयों तक नहीं पहुंचता और न कानूनी लड़ाई शुरू होती क्योंकि अजमेर में हर कोई जानता था कि आरोपी कौन हैं ! इस कुकाण्ड को करनेवाले दुर्दांत अपराधी थे मशहूर चिश्ती जोड़ी फारूक और नफीस तथा उनके दोस्तों का गिरोह – जो अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े बड़े परिवार से संबंधित थे। इन लोगों ने स्कूल जाने वाली कई सारी युवतियों को महीनों तक धमकियों और ब्लैकमेल के जाल में फंसाया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। एक फोटो कलर लैब ने इन महिलाओं की नग्न तस्वीरें छापी और उन्हें वितरित करने में मदद की। जब यह सारी खबर सामने आई, तो अजमेर में धार्मिक तनाव बढ़ गया और पूरा शहर बंद भी हो गया. लेकिन, बहुत से लोग नहीं जानते थे कि ये महिलाएं कौन थीं और उनके मामले के सार्वजनिक बहस में के बाद वे कहां गायब हो गईं?


स्थानीय मीडिया ने इन युवतियों को ‘आईएएस-आईपीएस की बेटियां‘ कहा, लेकिन वे सिर्फ कुलीन घरों से ही नहीं थीं , उनमें से कई सरकारी कर्मचारियों के मामूली, मध्यमवर्गीय परिवारों से भी आती थीं, जिनमें से कई इस हो-हंगामे के कारण अजमेर छोड़ के चले गए। पुलिस के रिकॉर्ड (अभिलेख) में इन बलात्कार पीड़िताओं के प्रथम नाम और सरकारी कॉलोनी के उन अस्पष्ट पतों का उल्लेख है, जहां से वे बहुत पहले चलीं गयीं थीं। उस समय की स्कूली छात्राएं रहीं ये सामूहिक बलात्कार पीड़िताएं अपने-अपने पतियों, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ अलग-अलग शहरों में चली गईं, जिससे पुलिस के लिए उनका पता-ठिकाना रखना लगभग असंभव हो गया। पिछले कई दशकों से, किसी आरोपी के आत्मसमर्पण करने या उसके गिरफ्तार होने पर अदालतों ने हर बार इन पीड़िताओं को बुलाया। जब भी सुनवाई शुरू हुई, पुलिस वाले समन देने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं के घरों पर जा धमके। वकीलों का कहना है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (क्रिमिनल प्रोसीजर कोड) की धारा 273 के तहत, अदालत को आरोपी की उपस्थिति में पीड़िता की गवाही दर्ज करनी होती है – यह एक ऐसी प्रक्रिया जो इन महिलाओं को फिर से आघात पहुंचाती है।


इसे लेकर पुलिस भी हताश-परेशान होती है। अजमेर स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार के दरगाह थाना प्रभारी दलबीर सिंह पूछते हैं – ‘कितनी बार हम उन्हें अदालत में घसीटेंगे? फोन करने पर वे हमें गालियां देती हैं।जब भी वे अपने दरवाजे पर किसी पुलिसकर्मी को देखती हैं, तो वे आतंकित हो जाती हैं। ‘ करीब एक साल से सिंह को समन देने और पीड़ितों को अदालत में लाने का काम सौंपा गया है। उन्होंने इसे ‘एक बहुत ही मुश्किल काम’ के रूप में वर्णित करते हुए कहा, ‘एक परिवार ने कहा कि उनकी बेटी की मौत हो चुकी है। एक और परिवार ने मुझे धमकी देने के लिए वकील भेजा। कम-से-कम तीन पीड़िताओं ने अदालत में अपना बयान दर्ज कराने के बाद आत्महत्या की कोशिश की। ’

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