Opinion

नारी अस्तित्व के लिए संघर्ष – तिसरी कड़ी

बार-बार गर्भावस्था, कमजोरी, उपेक्षित गर्भपात, भयप्रद प्रसव, समय से पहले प्रसव, प्रसव के दौरान मृत्यु, मैंने कई बार अपनी आंखों से देखा है। अधिकांश बच्चे पैदा हुए और उनमें से अधिकांश की मृत्यु हो गई। इसलिए मुझे कोई जिज्ञासा नहीं है और न ही मृत्यु का भय है। गर्भनिरोधक को सार्वभौमिक रूप से तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा जब तक कि पुरुषों को प्रसव पीड़ा का अनुभव न हो।

जन्म नियंत्रण की माता मरियम मार्गरेट सेंगर

तिसरी कड़ी

हां मैं हूं गर्भनिरोधक या जनन नियमों की मां मार्गरेट सेंगर, एक जन्म नियंत्रण कार्यकर्ता, एक यौन शिक्षा अधिवक्ता, और हाँ एक नर्स। मुझे मार्गरेट लुईस हिगिंस सेंगर के नाम से भी जाना जाता है।मेरा जन्म 14 सितंबर, 1879 को न्यूयॉर्क में एक गरीब परिवार में हुआ था। पिता एक खुले विचारोंके राजमिस्री, एक आयरिश अमेरिकी और माँ एक रोमन कैथोलिक थीं। पिता जो कुछ भी कमाते थे उसे शराब में उड़ा  देते थे।  राजनीति के बारे में सिर्फ बातें करते थे ! परिवार  की चिंता नहीं । मेरे पिता पितृसत्तात्मक समाज रचना के प्रतिनिधि थे। घोर भोगवादी । मेरी माँ क्या कर सकती थी? वैसेही वह एक रूढ़िवादी रोमन कैथोलिक ईसाई परिवार में पली-बढ़ी! जिस पंथ में जन्म नियंत्रण की अनुमति नहीं थी । उनके अनुसार यह अनैतिक, धर्म विरोधी है। स्त्री को पुरुष की दासी होनी चाहिए, भगवान ने  गर्भ और प्रसव का  श्राप उसे दिया है। महिलाओं को यह तय करने का अधिकार नहीं था कि उन्हें कब और कितने बच्चों को जन्म देना है। समाज ने इसे भी वः अधिकार नहीं दिया और धर्म ने इसे अस्वीकार कर दिया। अब ये बच्चा मुझे नहीं चाहिए- ऐसा कहना चाहिए ये तो किसी भी महिला को   पता ही नहीं नहीं था. माँ बहुत टेंशन में रहती थी, मुझसे देश नहीं जाता था. मुझे  अंदर ही अंदर बहुत दर्द होता-मन जल उठता था  वजह भी इतनी भयानक थी, दिल दहला देने वाली थी! 22 साल में वो कुल 18 बार प्रेग्नेंट- गर्भवती  हुईं! मेरे कार्य  की वजह मेरी मां बन गयी । उसके 11 बच्चे बच गए। उनमे से एक मैं मार्गरेट उसकी  छठी संतान हूं।मेरे आस-पड़ोस की सभी महिलाओं की भी यही स्थिति थी। बार-बार गर्भधारण, रक्ताल्पता, लापरवाही से गर्भपात, भयप्रद गर्भपात, समय से पहले जन्म, प्रसव के दौरान मृत्यु – मैंने इसे कई बार अपनी आंखों से देखा है। अधिकांश बच्चे पैदा हुए और उनमें से अधिकांश की मृत्यु हो गई। इसलिए मुझे जन्म की कोई जिज्ञासा नहीं रही  और न ही मृत्यु का भय रहा। असंवेदनशील पारिवारिक वातावरण, बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, गर्भ निरोधकों की और , वैज्ञानिक ज्ञान की कमी और सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक जागरूकता की कमी के कारण परिवार में कई बच्चे पैदा होते । इसका महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा था । परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। बहुत सारे बच्चे होने से महिला सेक्स से डरती है। इस तरह के डर  मानसिक विकारों को जन्म देते हैं। यह बलात्कार और वेश्यावृत्ति की ओर ले जाता है। इनमें से कई बीमारियां घरों में प्रवेश कर जाती हैं। इसलिए गरीबी हार नहीं रही थी। कारणवश , माता-बच्चा  मृत्यु दर बढ़ रही थी।गर्भ निरोधकों की कमी और लगातार प्रसव के कारण कई महिलाएं तपेदिक (क्षय) रोग की  शिकार हो रही थीं। गर्भपात को रोकने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान की कमी के कारण,  गर्भपात करवाती  और दस्त से मर जाती । मेरे देश में या यूरोप में भी बाल विवाह की प्रथा नहीं थी- फिर भी ये स्थिति थी । तो फिर   एशिया और अफ्रीका में  तो ये क्यूँ   ऐसे  असंख्य विचारों से परेशान थी । इसलिए मैंने फैसला किया कि स्थितिपर काबू पाना ही चाहिए और यही मेरा कार्य और क्षेत्र होगा।   1896 में मैंने क्लेवरक कॉलेज और हडसन रिवर इंस्टीट्यूट में प्रवेश लिया। और फिर 1902 में मैंने नर्स बनने का फैसला किया। मैं एक नर्स बनना चाहती थी और समाज में अपेक्षित बदलाव लाना चाहती थी। मैं नर्स बन गई। मेरा काम भी शुरू हो गया। मैंने तय कर लिया , चाहे कितनी भी विपत्तियां मेरे रास्ते में आएं, मैं हार नहीं मानूंगी । मैं न केवल लोगों को यह बताना चाहता थी  कि परिवार नियोजन/जन्म नियंत्रण क्या है बल्कि इसे उनके मन में भी बैठाना है। वह यह साबित करना चाहती थी  कि यह कितना फायदेमंद है। मै जानती थी कि  यह  इतना आसान नहीं है। इसके लिए मुझे समाज में क्रांति लानी होगी।  खुद क्रांतिकारी बनना होगा। विद्रोह करना होगा।  प्रवाह के विरुद्ध जाना पड़ेगा । मुझे इसका पूरा अंदाजा था और मैं इसके लिए तैयार थी ।1912 में, मैंने  नर्स का  इस्तीफा दे दिया। मैं खुद को उन चार दीवारों तक सीमित नहीं रखना चाहता थी । यह कैटरपिलर अब एक तितली बनना चाहता था। मैंने एक आर्किटेक्ट से शादी की।  एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन बार मां बनना कैसा होता है- इसका मैंने अनुभव लिया । गोद  में ये तीन बच्चे और  न जाने भविष्य में और कितने बच्चे होंगे इस डर  से मै  परेशां हो जाती थी । मेरा दृढ़ विश्वास है कि परिवार नियोजन का निर्णय एक युगलका जोड़ी का  निर्णय होना चाहिए। बच्चे की देखभाल करना किसी एक महिला का काम नहीं है। प्रकृति द्वारा दिया गया मातृत्व का उपहार , धर्म, समाज, यहां तक कि उसके पति द्वारा भी उस पर नहीं थोपा जा सकता। नतीजतन, मैं अपने पति से अलग हो गई थी। मुझे अपने काम में और नैतिक समर्थन के रूप में मेरी मदद करने के लिए मेरे बहुत करीबी किसी व्यक्ती की जरूरत थी। अंत में ने  जे. एच. एच. स्लीव से 1922 में  शादी की। इस दौरान मैंने गर्भनिरोधक और यौन शिक्षा पर काफी अध्ययन किया,  शोध किया। मुझे अपने पति का समर्थन प्राप्त था। यहां के अमीर लोगों ने भी मेरी काफी मदद की।इस दौरान मैंने महिलाओं को अवांछित गर्भधारण, गर्भ निरोधकों के उपयोग और कम आय वाली महिलाओं के लिए सस्ते गर्भपात जैसे विषयों पर शिक्षित करना शुरू किया। हर लड़की और महिला को यह सारी जानकारी रखनी चाहिए ताकि वह अपने स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा कर सके।  मैंने पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में ऐसे विषयों पर लेख लिखना शुरू किया। अवसर मिलने पर  मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलती  । मैं न केवल चींटी बनना चाहती  थी  और चीनी इकट्ठा करना चाहती थी  बल्कि मधुमक्खी के छत्ते की  रानी मधुमक्खी की तरह नियंत्रक और प्रबंधक बनना चाहती थी ।आमतौर पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कई अमेरिकी सैनिक यौन रोग/यौन संचारित रोग के जाल में फंस गए थे। फिर १९१३ में मैंने उपरोक्त रोग पर मैंने एक लेख लिखा। बीमारी की सच्ची सच्ची जानकारी और  मेरी कथित संलिप्तता के लिए उस लेख को “इन डिसेंट” मानकर  ,मुझे पांच साल जेल की सजा सुनाई गई थी। इस डर से कि कहीं यह मेरे काम में बाधा न बन जाए, मैं यूरोप भाग गई , जहाँ मैं बिलकुल भी चुप नहीं बैठी । गर्भनिरोधक गोलियों पर शोध अध्ययन किया। यह वह शोध है जिसे मैंने गुप्त रूप से अमेरिका भेजा । ये गोलियां संयुक्त राज्य अमेरिका में बनाई जाने लगीं। उसका वितरण भी शुरू हो गया। मैं संयुक्त राज्य अमेरिका लौटी । मैंने अपना काम फिर से शुरू किया।जब यह सब चल रहा था, मेरे मन में एक विचार आया कि एक महिला का स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए। गर्भनिरोधक केवल महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए होना चाहिए। गर्भपात का समय नहीं आना  चाहिए। फिर पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए कानून बनना चाहिए। लेकिन अगर यह कानून दमनकारी होगा  तो यह काम नहीं करेगा । तो सब कुछ नैतिक रूप से और बहुत सामंजस्यपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए। एक महिला को बच्चे पैदा करने में खुशी  होनी  चाहिए। पूरी तरह से स्वार्थी रवैये के साथ काम न करें। केवल वृद्धावस्था में बच्चे चाहिए इसलिय बच्चे चाइये क्या ?  यह देश के कल्याण के लिए किसी काम का है? इस पर विचार करना बहुत जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो सरकार इसके लिए भुगतान क्यों करे,पिसा क्यूँ खर्च करें ? गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार, बच्चे के जन्म का खर्च और कुपोषित बच्चे न जन्मे और उनको रोकने के लिए सरकार को विभिन्न योजनाएं क्यों लागू करनी चाहिए? हर नवविवाहिता को यह विचार देना चाहिए। स्कूली शिक्षा में यौन शिक्षा शामिल होनी चाहिए। विषय को सेक्स कहीए ,लौंगिक या और कुछ कहिए , लेकिन यह एक सफल जीवन की कुंजी है। इसलिए इसे टालने से बिल्कुल भी काम नहीं चलेगा।समाज के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाना आवश्यक है। बच्चे को जन्म देना अपराध हो  ही नहीं सकता। एक-दो संतान का तो सवाल ही नहीं है। असली समस्या यह है कि क्या संतानों को मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति वैध तरीके से हो पाएगी? क्या परिवार उसका समर्थन करने में सक्षम है? एक परिवार से ज्यादा  लिए एक महिला के लिए इसे समझना ज्यादा जरूरी है। यानी वह पुरुष क्रूरता का शिकार नहीं होंगी। यह मैंने धीरे-धीरे अपने समाज में समाहित करना शुरू कर दिया। छिपे छिपे क्यूँ ना हो मुझे अपने समुदाय से  समर्थन मिलना शुरू हो गया।1914 में, आंदोलन का विस्तार करने का निर्णय लिया गया। उसके लिए हमें घर-घर जाकर महिलाओं तक पहुंचना था। महिलाएं अखबार और पत्रिकाएं पढ़ रही थीं। फिर मैंने “वुमन रिबेल” नाम से एक पत्रिका शुरू की और उसमें गर्भनिरोधक के रूप में लिखना शुरू किया। घर-घर में महिलाएँ  पढ़ने, चर्चा करने लगीं। मामला सरकार तक पहुँचा ।  इस विषय को अश्लील बताकर प्रतिबंधित कर दिया। तब मुझे लगा कि पत्रिकाओं का वितरण एक समस्या है, बाधाएं हैं। इसके लिए मैंने एक किताब लिखने का सोचा। उन्होंने “परिवार नियोजन” नामक पुस्तक लिखी और गुप्त रूप से इसकी 1 लाख प्रतियां छापीं। कॉमस्टॉक कानून के तहत भी मेरे लेखन को असामाजिक बताकर प्रतिबंधित कर दिया।इस दौरान मैं ने यूरोप के  इंग्लैंड, फ्रांस, हॉलैंड आदि के विशेषज्ञों के संपर्क किया । मैंने अपने विषय के बारे में इंग्लैंड के  स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. हेवलॉक (Heavlock)  एलिस से बहुत कुछ सीखा। 1915 में हॉलैंड बर्थ कंट्रोल सेंटर का दौरा करने के बाद 1916 में अमेरिका के ब्रुकलिन में पहला जन्म नियंत्रण क्लिनिक खोला । अकेले पहले दिनही  150 महिलाएँ  मेरे केंद्र में मिलने आई  । सरकार घबरा गई। पुलिस ने 10 दिन के अंदर मेरा सेंटर बंद कर दिया. लोग मुझ पर भ्रष्ट, जाति विरोधी, नवजात शिशुओं की  हत्यारा होने का आरोप लगाने लगे। इसके लिए मुझे 30 दिन की जेल की सजा भी  सुनाई गई थी। लेकिन मेरे समर्थकों के समर्थन से सरकार को उनके विरोध के आगे झुकना पड़ा. मेरे वकीलों ने केस जीतने में मेरी मदद की.  डॉक्टर किसी भी महिला को  परिवार नियोजन की जानकारी दे सकते  हैं। अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि उनसे जानकारी को छुपाया नहीं जा सकता है। वे कहते हैं, ना “जिसका कोई नहीं होता होता उसका भगवान होता है या मराठी में देव तरी त्याला कोण मारी”” मेरे विचार विजयी हुए। मैं जन्म नियंत्रण की माँ बन गई। बर्थ कंट्रोलकी मैं  जननी बनी .बाद में अमेरिकन बर्थ कंट्रोल लीग की स्थापना 1921 में हुई थी और यह अमेरिका का नियोजित पितृत्व संघ प्लान्ड पॅरेंटहूड फेडेरेशन बन गया। दूसरा  क्लिनिक 1923 में खोला गया । इस बार मुझे जबरदस्त सप्पोर्ट-समर्थन   मिलने लगा । संकेत थे कि मेरे काम का दायरा वैश्विक होने वाला था। मुझे दुनिया के विभिन्न हिस्सों से व्याख्यान के लिए निमंत्रण मिलने लगे। लेकिन कहते हैं ना  “कुत्ते की पूंछ टेढ़ी है।” सरकार का मुखिया रव्वैया  ठीक नहीं था। वे मुझे बार-बार गिरफ्तार करते थे। लेकिन मुझे जो समर्थन मिला, उसकी वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ता था . मुझे रिहा कर दिया जाता था । फिर मैंने यूजीनिक्स का अध्ययन शुरू किया। मेरा ध्यान चयनात्मक प्रजनन के माध्यम से आनुवंशिक लक्षणों में सुधार पर था। ताकि कमजोर और विकृत लोगों के जन्म पर अंकुश लगाया जा सके। इस बार मुझ पर नस्लवादी होने का आरोप लगाया गया। मैं नहीं रुकी ।मैंने १९२३ में जनसंख्या नियंत्रण और बढ़ती गरीबी के उन्मूलन पर काम करने के लिए भारत जाने का फैसला किया। लेकिन भारत जाना इतना आसान नहीं था। भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उन्होंने मेरे भारत में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। इस अवधि के दौरान भारत में कई समाज सुधारक जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन पर कड़ी मेहनत कर रहे थे। महर्षि धोंडो केशव कर्वे के सुपुत्र रघुनाथ धोंडो कर्वे ने 1921 में भारत में पहला परिवार नियोजन केंद्र शुरू किया। मेरी तरह वह भी इस काम से काफी प्रेरित थे । रघुनाथ कर्वे के जन्म के समय उनकी माता की मृत्यु शैशवावस्था में ही हो गई थी। इसलिए हर महिला को प्रेग्नेंसी के बारे में सही जानकारी की जरूरत होती है, उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके लिए महिलाओं को शिक्षित होने की जरूरत है। वह यौन शिक्षा के बारे में जागरूकता बढ़ाने के इच्छुक थे। मैं उनके संपर्क में थी । हम इन विषयों पर चर्चा  करते  थे। विचारों का आदान-प्रदान हुआ। उन्होंने खुद को बच्चे नहीं होने दिया। अमेरिका में रहते हुए भी मैं  जो ना कर सकी  वो कर्वेजिने  भारत में  कर दिखाया । यह काम बहुत ही हार्डकोर साबित हुआ।ना  सी फड़के और लोकहितवादी  भी इस काम में सक्रिय थे। ना सी फड़केकी  के उपन्यास “यौन समस्या” के लिए मैंने  प्रस्तावना लिखी । मैं उन्हें अपने शोध पत्र यहीं से भेजा करती थी।   मेरी ये  मूवमेंट दुनिया में कहीं चल रही थी । विभिन्न देशों में वह फ़ैल रही थी । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, मेरे आंदोलनों और गर्भनिरोधक अनुसंधान बहुत उपयोगी साबित हुवे । लाखों सैनिकोंकी की जान बचाई गई। 1945 में, नियोजित पितृत्व संघ की स्थापना प्लानड  पॅरेंटहूड अससोसिएशनकी गई और पूरे देश में जन्म नियंत्रण केंद्र स्थापित किए गए। 1952 में मैं एसोसिएशन की  अध्यक्ष बनीं । इस पद पर १९५९ तक रही । मैं प्रसन्न हुई । 1953 में, मैंने भारत जाने का फैसला किया। वह मेरा सपना था। मैं रघुनाथ कर्वे से मिलना चाहती थी । मैं अपने काम का विस्तार करना चाहती थी  लेकिन इससे पहले दुर्भाग्य से रघुनाथ कर्वे की मृत्यु हो गई। हम नहीं मिल पाए। मेरे मन में एक बड़ा दुख रह गया।तत्पश्यात  तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुझे १९ फरवरी १९५९ को भारत में परिवार नियोजन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के छठे सत्र को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया। परिवार नियोजन का महत्व यह विषय मुझे दिया गया। पंडित नेहरू ने मेरे काम और दुनिया भर में आंदोलनों की प्रशंसा की। मैं मदर मैरी बन गई थी। यहां तक ​​कि महात्मा गांधी जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी धार्मिकता की आड़ में इस विचार का विरोध किया। मैं दंग रह गई थीं । यहां के हालात को देखते हुए मैंने गहराईसे   महसूस किया कि मेरे काम की असली जरूरत हर मां और बच्चे को  है। मेरे काम की रूपरेखा और मेरे आंदोलन की रूपरेखा यहां के समाज के लिए बिल्कुल एक जैसी है। यदि आर्थिक विकास का लाभ जन-जन तक पहुँचना है तो प्रजनन क्षमता को कम करके जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना आवश्यक है।

जन्म नियंत्रण क्या है? अतः प्रत्येक परिवार को सुखी बनाने, आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने और देश का विकास करने के उद्देश्य से परिवार में संतानों की संख्या की सीमा निर्धारित करना – भले ही सरकार दरबार में यही अर्थ लिया जाता था ,पर  एक महिला भी  पुरुष की तरह एक मनुष्य  होती है, न कि बच्चों को जन्म देने की मशीन। प्रसवता याने स्त्रीका दूसरा जन्म कह कर  हैस्त्री पर कितने जन्म थोपे जाने चाहिए? क्योंकि प्रसव को ? बेटा – पुत्र  चाहिए इसलिए ?  धर्म-विरोधी है, इसलिए वह इस जीवन देने की -मृत्यु चक्र से स्त्रीकी मुक्त नहीं है। मार्गरेट यह अभी शुरुआत है। गर्भनिरोधक को सार्वभौमिक रूप से तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा जब तक कि पुरुषों को प्रसव पीड़ा का अनुभव न हो।

नाम:- सुनंदा राजेंद्र नेरकरी
शिक्षा: – एम.कॉम।  बीएड.।

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