Opinion

नारी अस्तित्व के लिए संघर्ष – चौथी कड़ी

जिस धर्म में वो थी, वहा पास्टर का स्थान एक महिला को कभी नहीं मिल सकता था। जिस महिलाने बाइबिल का मराठी में अनुवाद किया। यीशु का संदेश सभी तक पहुँचाया । रमाबाई के मुक्ति मिशन के माध्यम से, उन्होंने अकाल से पीड़ित सैकड़ों गरीब ग्रामीण महिलाओं को ख्रीस्त का रास्ता दिखाया। उसके ही सामने उसी ने स्थापित किये हुए मिशन में उसके नारीवादी सिद्धांतों पर प्रहार करनेवाली घटना घटी।

मेरी रमा
शापित सरस्वती

1858 की गर्मियों में, कर्नाटक के पश्चिमी घाट के गंगामूल इस छोटे से गाँव में अनंत शास्त्री और लक्ष्मीबाई इन दम्पति के घर एक कन्या रत्न का जन्म हुआ । अपनी अनूठी विद्वता, अमोघ वक्तृत्व, तथा बंडखोर वृत्ति की इस लड़की ने इतिहास के पन्नों पर अपनी छाप छोड़ी। जी, हां, ये वही रमा है। छोटी रमा का सफर यह पंडिता रमाबाई और आगे जाकर मेरी रमा इस तरह कई मोड़ लेनेवाला, विवादग्रस्त, सामाजिक बदलाव लानेवाला ठहरा। पौर्वात्य हो या पाश्चात्य सुधारवादी, कर्मठ धर्ममार्तंड जिनका उल्लेख किए बिना अपना इतिहास पूरा नहीं हो सकता, ऐसी पंडिता रमाबाई

अनंत शास्त्री संस्कृत भाषा में प्रभुत्व रहे एक महान व्यक्ति थे और बहुत ही प्रगतिशील विचारक थे। महिलाओं की शिक्षा वेदों पर आधारित थी, यह सबूत के बल पर साबित करते हुए उन्होंने इसपर ग्रंथ लिखे । इन ग्रंथों को उस समय के विद्वानों ने, शास्त्रियों ने अपने हस्ताक्षरों से अनुमोदित किया था। उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मीबाई को संस्कृत की पूरी शिक्षा दी थी। अर्थात यह विरासत आगे बढ़ेगी, इसमें कोई संदेह नहीं था । रमा की शिक्षा उनकी माता के गोद में ब्राह्म मुहूर्त पर संस्कृत श्लोक के पठन से शुरू हुई। कोई दैवीय चमत्कार जैसे रमा ने छोटे से उम्र में ही संस्कृत में प्रभुत्व हासिल किया था।

आगे शास्त्री जी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई और परिणामस्वरूप उन्हें अपना घर और जमीन कर्ज पर बेचना पड़ा। रमा के बड़े भाई और नौ वर्षीय रमा को लेकर उस परिवार को तीर्थक्षेत्र की मुसाफिरी करते देश भर में घूमना पड़ा। एक-एक कर के रमा को अपने माता, पिता और भाई की मृत्यु का गहरा आघात सहना पड़ा।

ज्ञानोपासक के कलकत्ता में रमाबाई की वाक्पटुता, स्त्री शिक्षा और बाल विवाह इन दोनों पर उनके स्पष्ट विचारों के लिए कलकत्ता में ज्ञानोदय की सराहना की गई। न केवल सुधारवादी बल्कि सनातनवादियों ने भी रमाबाई के ज्ञान की सराहना की। उन्हें “सरस्वती” की उपाधि दी गई । श्री बिपिनबिहारी मेधावी इन वकील के साध उनकी शादी हुई। वह जाति से कायस्थ थे। इस अंतरजातीय विवाह ने तब काफी हलचल मचाई थी। लेकिन रमाबाई का व्यक्तित्व करारी और बंडखोर था। कुछ समय के बाद उन्हें कन्यारत्न “मनोरमा” प्राप्त हुआ। नियति के मन में कुछ और ही था। उनके पति श्री मेधावी का कॉलरा से देहांत हुआ। रमाबाई फिर अकेली पड़ गईं। जैसे-जैसे वे अधिक से अधिक अकेली पड़ी वैसे वैसे प्रभु पर की उनकी श्रद्धा और विश्वास और मजबूत होता गया और उनका शिक्षा कार्य भी और प्रखर होता गया।

पंडिता रमाबाई ने शिक्षण पेशे में प्रवेश करने का फैसला किया। उन्होंने पुणे में स्थलांतरण किया। उन्होंने आर्य महिला समाज की स्थापना की। इस संघटनाने जल्द ही महिला शिक्षा और बाल विवाह विषय में समाज को संगठित करना शुरू किया। इस काम में उनके साथ पुणे के समाजधुरीण भी थे। शीघ्र ही महिला आर्य समाज की शाखाओं का विस्तार देश के अनेक स्थानों पर हो गया। वे अपने सुधारवादी विचारों को अपने आक्रमक अंदाज में व्यक्त करते थे। इसका नतिजा जो होना चाहिए था. वहीं हुआ ।

हंटर कमीशन के सामने उन्होंने व्यक्त किये हुए अपने विचार और महिलाओं के लिए एक महिला डॉक्टर होने पर उनके विचारों को प्रत्यक्ष रानी एलिजाबेथ ने ध्यान में लिया । अपने काम में शिघ्रता लाने के लिए रमाबाई की भारतीय सीमा पार करने की सोच बढ़ने लगी। एक महिला डॉक्टर ही एत्तदेशीय महिलाओं की जिंदगी बदल सकती है। इस सिद्धांतपर आकर उन्होंने चिकित्सा शिक्षा के लिए इंग्लैंड जाने का फैसला किया। पश्चिमी लोगों से मिल रहे मुक्त प्रतिसाद की वजह से वह शायद ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के लिए प्रेरित हुए होंगे ।

1882 में, उस धर्मांतरण से पहले, रमाबाई ने चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड जाने का फैसला किया। हालांकि उनके इस फैसले का कई ईसाई मिशनरियों ने विरोध किया। उन्होंने सिस्टर सुपीरियर ऑफ मेरी होम, पुणे और कई अन्य यूरोपीय मिशनरियों से इसके बारे में पूछा। पर निराशा हाथ लगी। एक सिस्टरने ने उसे इंग्लैंड जाने के लिए ईसाई बनने के लिए कहा। कुछ ने उसे सेंट मैरी के घर पढ़ने के लिए जाने के लिए कहा, और फिर वे उसकी यात्रा का फैसला करेंगे।

तो एक सिस्टरने उनसे कहा कि वह अपनी दो साल की बेटी को इंग्लैंड नहीं ले जा सकती। इंग्लैंड जाने से पहले, एक पाद्री ने रमाबाई से संपर्क किया और उसे इंग्लैंड न जाने के लिए कहा। जब उन्हें पता चला कि रमाबाई हार नहीं मान रही हैं, तो उन्होंने कहा कि वह उनकी इंग्लैंड यात्रा की जिम्मेदारी नहीं लेंगे और अगर वह वास्तव में जाना चाहती हैं, तो उन्हें अपने जोखिम पर जाना चाहिए। परिस्थितियों की चुनौतियों और प्रखर विरोध पर विजय हासिल कर अपनी पसंद का रास्ता तैयार करना, यह रमाबाई के व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन गया ।

एचएमएस बुखारा जहाज से रमाबाई इंग्लंड रवाना हुई। उन्हें आलोप डेक (जहाज का सबसे कम डेक) केबिन दिया गया था। केबिन में छह बेड थे। पर अन्य यूरोपीय लोगों ने उस डेक में रहने से परहेज किया क्योंकि रमाबाई और उनकी सहकारी काली मतलब भारतीय थी। रमाबाई के शब्दों में, “हमारी हवा भी लगे तो वह भ्रष्ट होंगे, इस भय से कोई यूरोपीय औरतें हमारे कक्ष में रहने को नहीं आयीं। “

इंग्लैंड जाकर उधर के सेंट मेरी होम में उन्हों ने प्रथमतः अंग्रेजी भाषा की शिक्षा लेना प्रारम्भ किया। कुछ समय बाद २९ सितम्बर १८८३ को उन्होंने और उनकी लड़की ने चर्च ऑफ़ इंग्लैंड से ईसाई धर्म की दीक्षा ली। वे ‘मेरी रमा’ नाम से जानने लगी।

रमाबाई मैरी रमा होने पर उनके ज्ञान और सामाजिक प्रतिष्ठा का इस्तेमाल धर्मप्रसार के लिए यूरोपीय महिलाओं से ज्यादा प्रभावी तरीके से किया जा सकता है, क्योंकि, रमाबाई की वैचारिक जड़ें हिन्दू संस्कृति में दृढ़ हुई है, और इसलिए धर्मनिष्ठा बदलने में वे ही ज्यादा प्रभावी रहेगी ऐसी राय अनेकों लोगों ने व्यक्त की थी।

येसु ख्रिस्त के बारे में माने गए तथाकथित चमत्कार बुद्धिजीवी मेरी रमा को बर्दाश्त होनेवाले नहीं थे । सब दुनिया की ओर, यह एक चमत्कार है, ऐसी भोली दृष्टि से देखने को उनका विरोध था। कोनसी भी विसंगति कोनसे भी स्वरूप में आयें, तो उन्हें वह बिलकुल बर्दाश्त होनेवाली नहीं थी। सीने पर क्रॉस परिधान करने को भी उनका विरोध था और उस क्रॉस के लैटिन अक्षर संस्कृत में लिखने का भी उन्होंने जोरदार विरोध किया। स्वाभाविकत: इस विरोध की वजह से उन्हें अनेकों लोगों का विरोध झेलना पड़ा, यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं हैं।

बहुत थोड़े कालावधि में उनके कुशाग्र बुद्धि का, ज्ञानलालसा का और प्रखर विचारों का प्रभाव सर्वत्र पड़ने लगा। उन्हें अनेकों जगहों से व्याख्यान के लिए निमंत्रण मिलने लगे और उनकी प्रशंसा होने लगी। कुछ काल बाद उन्हें आनंदीबाई जोशी के उन्हों ने लिए हुए वैद्यकीय शिक्षा के पदवीदान समारम्भ के लिए अतिथि के तौर पर न्यौता मिला। इसको ध्यान में लेते हुए, उन्हों ने साझा किये हुए विचार केवल भारतीय ही नहीं, तो जगत के सामाजिक रचना के लिए कितने संयुक्तिक थे, यह समझ में आते है।

फरवरी १८८६ में रमाबाई उनके पांच बरस की आयु के कन्या के साथ अमेरिका को, असल में कुछ महीनों के लिए ही गयी थी, पर उन्हें उधरके शिक्षापद्धति ने इतना प्रभावित किया की, वह शिक्षापद्धति, उनके किताबों की रचना, आकर्षक और दीर्घकाल रहनेवाली छपाई, ये सब छोटी – छोटी चीजें अपनी मातृभूमि में कैसे लायी जा सकती है, इस विचारों ने उनका बेहिसाब पीछा किया। इसीलिए स्त्रीशिक्षा के बारे में इतना तादात्म्य रहनेवाले जो उदाहरण हमें देखने को मिलते है, उनमें रमाबाई का नाम सम्मान से लेना पड़ेगा।

यद्यपि रमाबाई ने ईसाई धर्म चुना, तथापि, उनके हिन्दू संस्कारों को कोई चोट नहीं पहुंची। एक बुद्धिमान ने यद्यपि ऐसी बात सद्धेतु के लिए की, तभी भी ईसाई धर्म की ओर से उन्हें और उनकी छवि को योग्य प्रतिसाद मिला क्या? इसका उत्तर उतना सकारात्मक नहीं दिया जा सकता।

एक व्यक्ति की तरफ मानसिक दृष्टिकोण से देखने की बजाय वह क्या पहनती है, इसी मानदंड से वह सच में अपने धर्म का भाग है या नहीं यह निश्चित करना, क्या हास्यास्पद नहीं है?

पर तभी भी वह वैसे ही हुआ था।

डा. डोरोथी बेअल इस महिलाओं के कालेज के मुख्याध्यापिका ने मेरी रमा को प्रोफ़ेसर के तौर पर निमंत्रित किया। उनके इस निमंत्रण का इंग्लैण्ड के चर्च ने गंभीर विचार किया। इसके पीछे के कारण थे की, – (१) प्रोफ़ेसर होने के बाद मेरी रमा क्या पुरुषों को भी सीखा सकेगी? (२) वह उनके पहले के हिन्दू धर्म के विरोधि रहेगा, उसकी उधर गंभीर प्रतिक्रिया उभरेगी। (३) पैदाइशी यूरोपीय न रहते हुए, किसी व्यक्ति को ऐसे यूरोपीय महिलाओं की पंक्ति में सामान दर्जा से बिठाने पर भी गंभीर प्रतिक्रिया आएगी। (४) और भी, रमाबाई ईसाई होते हुए भी एक भारतीय स्त्री है, वे भला यूरोपियन लोगों की बराबरी कैसे कर सकेगी?ऐसे बादरायण संबंधों को भी ध्यान में लिया गया और मेरी रमा के लिए ‘टीचर शिप’ इस नए पोस्ट की खोज की गयी।

उन्होंने पुणे के नजिक केडगाव को मुक्ति मिशन की स्थापना की। इधर के चर्च में मेल पास्टर को नियुक्त करने के अलावा कुछ पर्याय नहीं था। मुक्ति मिशन में चर्च में पहला पास्टर रेव. डब्लू डब्लू ब्रुरे था और बाद में मिस्टर रॉबिन्सन की १८८९ में पास्टर के तौर पर नियुक्ति की गयी। उन्हें महिला पास्टर नियुक्त करने की बहुत इच्छा थी। पर रमाबाई जिस धर्म में थी, उसमें पास्टर का स्थान एक महिला को कभी भी नहीं मिल सकता था। जिस महिला ने बाइबल का मराठी में भाषांतर किया, येशु का सन्देश सभी तक पहुँचाया, मुक्ति मिशन के माध्यम से सैकड़ों सूखाग्रस्त गरीब ग्रामीण महिलाओं को ख्रिस्त का मार्ग बताया, उसी के सामने उसने स्थापित किए मिशन में उसके स्त्रीवादी तत्त्वों को हड़ताल पोतने का प्रसंग आया।

एक वेदसंपन्न संस्कृत शिक्षक की कन्या उसके साथ खडतर जीवन जीते हुए समाजविरोधी स्त्रीशिक्षा और बालविवाह का विरोध का पुरस्कार करते हुए देश में भटकती है, उस समाज में ऊपरी ओर से विरोध होते हुए भी अनंत शास्त्री के विचारों को उसी समाज में स्थान मिलता है, और स्त्रीशिक्षा की जड़ें दृढ़ की जाती है। स्वयं कन्या को विरोधी लगनेवाला यह समाज उसे पंडिता और सरस्वती इन पदवियों से गौरवान्वित करता है। और दूसरी ओर ऐसे विचार और ज्ञान इन दोनों स्तरों पर उच्च पद पर पहुंचे स्त्री को उसने अपना धर्म स्वीकारने के बाद भी वह समाज उसे प्रोफ़ेसर का स्थान तो देताही नहीं, ऊपर से उसके मार्ग में बाधाएं निर्माण करके उसका केवल धर्मप्रसार के लिए उपयोग करने की संकुचित भावना ही स्पष्ट करता है।

स्त्री का सम्मान उसे पेहराव की, वर्तन की स्वाधीनता देके नहीं होगा, अपि तु, उसके विद्वत्ता, नेतृत्व का आदर करके होगा, इसपर रमाबाई दृढ़ थी। जिस पंडिता रमाबाई को साक्षात् सरस्वती की उपाधि मिली थी, जिसके व्याख्यानों को न्यायमूर्ति रानडे के जैसे अध्वर्यू उपस्थित रहते थे, जिनके स्त्रीशिक्षा के कार्य को प्रोत्साहन देते थें, उन्हें पुरुष मिशनरी वर्ग ने ज्ञानदान करने के लिए विरोध किया, उसमें बाधाएं लाई । पंडिता रमा रहे या मैरी रमा, अपना कार्य करते ही रही।

यह एक सरस्वती शापित ही रह गयी।

शैलेश बाम , पुणे
सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कार्यरत
सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों के अभ्यासक

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