Opinion

नारी अस्तित्व के लिए संघर्ष – छटवी कड़ी

“स्वातंत्र्य हम सब का है और इसीलिए हम उसे मनाते है। तभी भी क्या आपको ऐसा लगता है की शुरुआत से ही अपने राष्ट्र को सेवा करने के लिए पुरुषों की आवश्यकता है? अपने राष्ट्र और इस्लाम के शुरुआती बर्षों में जैसे स्त्रियों ने भाग लिया, वैसे हम महिलाओं ने भी अपना सहभाग लेना चाहिए। हम सब ने ज्यादा से ज्यादा ज्ञान लेने का प्रयास करना चाहिए, जिससे की इस्लाम के शुरुआती स्त्रियों के पद्धति से समाज के प्रति हम अपनी सेवा दे सकें। “

एक स्त्री जिसने मुक्त भविष्य की ओर ध्यान आकर्षित किया।
मल्लिका सोराया

एक सार्वजानिक सभा में अफगानिस्तान जैसे कट्टरपंथी मध्ययुगीन मानसिकतावाले देश के बादशाह की मल्लिका अपना बुरका फाड़ती है। इस क्रांतिकारक कृति से इतिहास में अजरामर हुई मल्लिका। स्त्री को बंधन में रखना अयोग्य है,ऐसी भूमिका रखनेवाली। उसके पूर्व अफगानिस्तान में ऐसी मल्लिका अथवा राष्ट्रप्रमुख की बेगम हुई नहीं थी, अबतक नहीं हुई है। महिलाओं को सामान हक़, शिक्षा और आधुनिकीकरण के आधार पर समज की रचना आदि की कट्टर समर्थक रहनेवाली, जिसने अपने देश में रहने के लिए एक सुयोग्य स्थान बनाने के लिए सुच में अपना ह्रदय समर्पित किया, ऐसी इतिहास की आधुनिक नायिका। …

मल्लिका सोराया शहजादा तारझी

इनका जन्म २४ नवम्बर १८९९ को सीरिया के दमास्कस में हुआ था। तब उनका कुटुंब निर्वासित था। वे अफगानिस्तान के महान बुद्धिजीवी सरदार गुलाम मुहम्मद तारझी की पोती, सरदार महमूद बेग तारझी और बेगम अस्मा रसमय खानम तारझी की लड़की थी। सोरया तारझी ने उनकी शिक्षा सीरिया में पूर्ण की। आधुनिक नैतिकता को आत्मसात किया, जिससे भविष्य की उनकी अद्भुत कार्य की नीव रखी गयी।

आमिर हबीबुल्लाह खान ने की हुई बिनती के अनुसार अफगानिस्तान में वापस आने के बाद दरबार में तारझी का स्वागत किया गया। ३० अगस्त १९१३ को शहजादे ने काबुल में सोरया तारझी से निकाह किया। महमूद तारझी उदारमतवादी विचारों के समर्थक थे। सोरया तारझी भविष्य के बादशाह अमानुल्ला खान की एकमेव मलिका बनी। अमानुल्ला खान मुक्त और प्रगतिशील विचारों के थे। उन्हों ने अफगानिस्तान की एक घटनात्मक राजतन्त्रवाद के रूप में नए से रचना की। शतकों की परंपरा तोड़कर अमानुल्ला खान सिंहासन पर बैठे। तब उन्हों ने शाही हरम विसर्जित किया और बंदीवास में रखे गए हरम की स्त्रियों को छोड़ दिया। उन दोनों ने अफगानिस्तान में अनेक बदलाव लेन को शुरुआत की। जैसे, की बहुपत्नित्व पद्धति पर कानून से पाबन्दी लायी। लड़कियों के लिए पाठशालाएं शुरू की। महिला सबलीकरण पर जोर दिया। स्त्रियों को सामान हक़, तलाक देने का हक़, जबरन बुरका पद्धति से उनकी मुक्तता, धर्मनिरपेक्ष न्यायलय, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, आदि पर जोर दिया, जो बात आज असंभव सी प्रतीत होगी।

महिलाओं के लिए सकारात्मक बदलाव लाने के लिए और राष्ट्रनिर्माण में सक्रीय भूमिका लेने के लिए मलिका सोराया बादशाह की एक प्रेरक शक्ति थी। १९२१ में उन्हों ने उनकी माँ का सम्पादित किया गया महिलाओं का पहला मासिक ‘इशादुल नस्वान (महिला मार्गदर्शन)’ और महिलाओं के कल्याण के लिए संघर्ष करनेवाला पहला महिला संगठन, अंजुमनी हिमायत निस्वान की स्थापना की। उसने पगमाह में एक नाट्यगृह का भी निर्माण किया, जो महिलाओं के अभिव्यक्तिस्वातंत्र्य का केंद्र बना।

“मैं तुम्हारा बादशाह हूँ, पर शिक्षामंत्री मेरी बेगम है – आपकी मलिका।” राजा अमानुल्ला खान ने अपने मलिका के लिए ये गौरवोद्गार कहे थे। १९२१ में मलिका सोरायाने लड़कियों के लिए काबुल की पहली प्राथमिक पाठशाला, रुग्णालय शुरू किया। १९२६ में ब्रिटिशों से लिए गए स्वातंत्र्य के सातवें वर्धापन दिन के निमित्त सोरया ने एक सार्वजनिक निवेदन दिया।

“स्वातंत्र्य हम सब का है और इसीलिए हम उसे मनाते है। तभी भी क्या आपको ऐसा लगता है की शुरुआत से ही अपने राष्ट्र को सेवा करने के लिए पुरुषों की आवश्यकता है? अपने राष्ट्र और इस्लाम के शुरुआती बर्षों में जैसे स्त्रियों ने भाग लिया, वैसे हम महिलाओं ने भी अपना सहयोग लेना चाहिए। हम सब ने ज्यादा से ज्यादा ज्ञान लेने का प्रयास करना चाहिए, जिससे की इस्लाम के शुरुआती स्त्रियों के पद्धति से समाज के प्रति हम अपनी सेवा दे सकें।”

अमानुल्लाह के राजगद्दी पर बैठने से पूर्व भी राजघराने की महिलाएं पश्चिमी पद्धति का पोषक परिधान करती थी। परन्तु वह केवल रजवाड़े के बंद परिसर में ही, अन्यथा, शाही परिसर से बाहर निकलते समय हमेशा बुरका पहनती थी। परन्तु मलिका सोरयाने पारदर्शक बुरकावाली चौड़ी टोपी पहनी। अमानुल्लाह बोले की, “इस्लाम स्त्रियों को उनका शरीर ढकने के लिए या विशेष प्रकार का बुरका पहनने को मजबूर नहीं करता। ” और उन्हों ने पत्नी को बुरका निकालने के लिए कहा। भाषण के अंत में रानी सोरया ने अपना बुरका खुले आम फाड़ दिया। और उन्होंने कहा की, धर्म के ठेकेदार हमें यह न सिखाये की, महिलाओं ने अपना शरीर पूरी तरह से ढक लेना चाहिए। उपस्थित स्त्रियों को भी ऐसा करने के उन्हों ने प्रेरित किया। तब से सोरया बुरका के बगैर सार्वजनिक तौर पर घूमने लगी। अनेक महिलाओं ने उनका अनुसरण किया।

बादशाह अमानुल्लाह ने किये हुए सुधारित बदलाव की कट्टरपंथियों में विस्फोट के चिह्न दिखने लगे। मलिका है तो क्या हुआ? एक स्त्री ने ऐसे मुक्त, बुरका के बगैर घूमना आधुनिकीकरण का पक्ष लेना, उन्हें कैसे हजम होता? ऐसे बदलाव धर्मांध कट्टरपंथी वर्ग को अपने अस्तित्व के लिए धोखा तो लगेंगे ही। उन्हें बादशाह और मलिका के शासन में असुरक्षित लगने लगा। ‘मजहब खतरे में है’, ऐसा कह कर, यह विकास के ओर लेके जानेवाला अत्याचारी शासन उखाड़ देने के लिए १९२३ और १९२४ में विद्रोह हुआ। पर बादशाह अमानुल्लाह ने वह यशस्वी तरीके से तोड़ डाला।

पर १९२९ में विद्रोह यशस्वी हुआ। बादशाह अमानुल्लाह और मलिका सोराया को सम्पूर्ण राजपरिवार सहित भागना पड़ा। तब उन्हों ने भारत में आश्रय लिया था। मुंबई में उनके सबसे छोटे लड़की का जन्म हुआ और उसका नाम देश के सम्मान में ‘इण्डिया’ रखा गया। उसके बाद में वे रोम में स्थलांतरित हो गयी। उस निर्वासित स्थिति में मलिका सोराया राजपरिवार के साथ वही पर रही। मलिका सोराया तरझी ने २० अप्रैल १९६८ में रोम में अंतिम सांस ली। तब उनके पार्थिव को अफगानिस्तान में लाया गया और जलालाबाद में उनके पति के बाजू में दफ़न किया गया।

अफगानिस्तान की मलिका के तौर पर उन्हों ने बिताये हुए १० बरसों के काल में, सोराया तरझी ने उनके देश के स्त्रियों को छलांग लगनेवाले भविष्य का रोमांचकारी दृष्टिकोण दिया, जिसे शतकों के बाद भी अबतक पूरी तरीके से मान्यता नहीं मिली है।


– रितिका राजेश बनकर
BE (ENTC)
कोरेगाव पार्क पुणे

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