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आंवला नवमी : कोसी व ब्रजभूमि परिक्रमा प्रारंभ करने का दिन

हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी मनाई जाती है। आंवला नवमी को अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल 13 नवंबर, 2021 यानी आज आंवला नवमी है। इस दिन महिलाएं आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर संतान प्राप्ति और उनकी सलामती के लिए पूजा करती हैं। इस दिन आंवला के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करने का भी चलन है। आंवला नवमी के पावन दिन व्रत कथा को पढ़ने या सुनने का भी विशेष महत्व होता है।
अक्षय नवमी / आंवला नवमी में किये गए पूजा पाठ जप अनुष्ठान एवं दान का अक्षय फल प्राप्त होता है।
सक्षम लोग यथा सम्भव जप अनुष्ठान करें और आपके गाँव घर के पुरोहितों / तीर्थपुरोहितों और जरूरमन्दों को यथाशक्ति यथाभाव कुछ अवश्य दान दें।

कार्तिक मास में वैसे तो हर दिन का विशेष महत्व है, लेकिन कार्तिक शुक्ल नवमी का महात्म्य पुराण प्रसिद्ध है। कार्तिक माह की इस नवमी को अक्षय नवमी और लोकभाषा में आंवला नवमी भी कहते हैं।

कैसे होती है पूजा-
इस दिन आंवला ( Gooseberry) वृक्ष के नीचे भोजन पकाने, खाने और गुप्तदान की सदियों पुरानी परंपरा है, जिसका निर्वहन सनातनी पूरी नेम-निष्ठा से करते हैं। कई अन्य पर्वों की तरह यह व्रत भी महिलाओं द्वारा संपादित होता है। वे प्रातःकाल उठकर स्नान-ध्यान से निवृत होकर आंवले के वृक्ष के नीचे पहुंचती हैं, आंवले की विधि पूर्वक पूजा करती हैं। सामूहिक रुप से आंवले के पेड़ में धागा (कच्चा सुता) लपेटती हैं और फिर वहीं खाना पकाकर परिजनों और संगे-संबंधियों के साथ खाती हैं। मान्यता है कि इस दिन किया जाने वाला गुप्त दान बहुत फलदायी होता है।

अक्षय / आंवला नवमी की पौराणिकता-
शास्त्रकारों के अनुसार अक्षय नवमी को ही द्वापर युग का प्रारंभ होता है। इसके युगावतार भगवान श्रीकृष्ण से भी इस तिथि का संबंध है। कहते हैं कि शुक्ल पक्ष की आंवला नवमी के दिन ही श्रीकृष्ण ने वृंदावन से मथुरा प्रस्थान किया था।
एक और कथा है कि कंस को मारने से पहले श्रीकृष्ण ने इसी दिन ब्रजभूमि के तीन वनों (पर्वतों) की परिक्रमा की थी, आज भी लाखों श्रद्धालु इस परंपरा को मानते हुए ब्रजभूमि की परिक्रमा करते हैं। ब्रजभूमि का परिक्रमा मार्ग इसकी पुष्टि करता है।
अयोध्या की ऐतिहासिक चौदह कोसी परिक्रमा भी अक्षय नवमी से आरंभ होती है, जो 24 घंटे की होती है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु अयोध्या पहुंचते और परिक्रमा में भाग लेते हैं। शास्त्रों में भगवान विष्णु द्वारा कुष्माण्डक नामक दानव के इसी तिथि को वध किये जाने की चर्चा मिलती है।

आंवला नवमी या युगादि नवमी की कथा


काशी नगरी में एक वैश्य रहता था। वह बात धमात्मा और दानी था, परन्तु उसके कोई सन्तान न थी। एक दिन उस वैश्य की स्त्री से एक औरत ने कहा-“तू किसी बच्चे की बलि भैरव पर चढ़ा दे तो तेरे सन्तान हो जायेगी। यह बात उस स्त्री ने अपने पति से कही। पति बोला, यह ठीक नहीं है, यदि किसी के बच्चे को मारकर मुझे भगवान भी मिलें तब भी मुझे स्वीकार नहीं है-बच्चे को प्राप्त करने की बात तो बहुत दूर है। पति की बात सुनकर वह चुप रही, परन्तु वह अपनी सहेली की बात नहीं भूली।

बात को सोचते-सोचते एक दिन उस वैश्य की स्त्री ने एक लड़की को भैरो बाबा के नाम पर कुएं में डाल दिया। लड़की की मृत्यु हो गयी, परन्तु उसके सन्तान नहीं हुई। सन्तान के बदले उसके शरीर से पाप फूट-फूट कर निकलने लगा। उसको कोढ़ हो गया। लड़की की मृत्यु उसकी आंखों के सामने नाचने लगी। वैश्य ने जब अपनी स्त्री से उसकी हालत का कारण पूछा तो उसने उस लड़की के विषय में बता दिया। तब वैश्य बोला, यह तुमने अच्छा नहीं किया क्योंकि ब्राह्मणवघ, गौवध और बालवध के अपराध से कोई मुक्त नहीं होता। अत: तुम गंगा के किनारे रहो और नित्यप्रति गंगा स्नान करो। इस बात को सुनकर वैश्य की पत्नी ने ऐसा ही किया एक दिन गंगाजी उस वैश्य पत्नी के पास एक बूढ़ी स्त्री का रूप धारण करके आई और कहने लगी, हे, बेटी! तू मथुरा में जाकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को व्रत रखना और आंवला की पूजा करकमथुरा की परिक्रमा करना। यह व्रत तीन वर्ष में तीन बार करना इससे तेरा मंगल होगा। इतना कहकर गंगाजी अन्तर्ध्यान हो गई। इस वैश्य की पत्नी ने यह बात अपने पति से कही, पति की आज्ञा ले उसने ऐसा ही किया, मथुरा में जाकर व्रत रखा आंवले की पूजा और मथुराजी की पांच कोस की परिक्रमा की। उसने यह व्रत तीन वर्ष तक लगातार किया। इस व्रत के प्रभाव से उस वैश्य-पत्नी का कोढ़ ठीक हो गया और एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ, जो अत्यधिक सुन्दर सुशील एवं गुणवान था।

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