Opinion

सिंधुताई : स्वयंदुखिया से दुःखतारिणी की यात्रा थमी

कबीर की पंक्तियों ‘जो तोको काँटा बुबै,ताहि बोय तू फूल ‘ को अपने जीवन और कार्यों से सार्थक करनेवाली महान समाजसेविका सिंधुताई सकपाल का निधन पुणे के गैलेक्सी अस्पताल में हृदयगति रुकने से हो गया।अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ शैलेश पुंताम्बेकर ने कहा, ‘ सपकाल का करीब डेढ़ महीने पहले हर्निया का ऑपरेशन हुआ था और वह तेजी से उबर नहीं पा रही थीं। सोमवार ४ जनवरी रात करीब आठ बजे दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।’ ‘स्वयं दुखिया से दुःखतारिणी ‘ की जीवन- यात्रा तय करनेवाली सिंधुताई को वर्ष २०१७ में नारीशक्ति राष्ट्रीय सम्मानित किया गया था ।वर्ष २०२१ में उनको पद्मश्री की उपाधि भी दी गई। अपने जीवन काल में उनको राष्ट्रीय -प्रांतीय और स्थानीय संस्थानों द्वारा ७५० से अधिक पुरस्कार और सम्मान मिले। 2010 में, उन पर एक मराठी बायोपिक, “मी सिंधुताई सपकाल” रिलीज़ हुई। इसे 54वें लंदन फिल्म फेस्टिवल में वर्ल्ड प्रीमियर के लिए चुना गया था।महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि हजारों बच्चों की देखभाल करने वाली सपकाल मां के रूप में साक्षात देवी थीं। भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट कर कहा कि उनके निधन से महाराष्ट्र ने एक मां खो दी है। वह विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए बड़ी हुईं और उन्होंने अपना जीवन उन लोगों को समर्पित कर दिया, जिन्हें समाज ने खारिज कर दिया था।

गरीबी में पली-बढ़ीं सपकाल को बाल्यावस्था में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। 14 नवंबर, 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में जन्मी सपकाल को चौथी कक्षा पास करने के बाद स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सिंधुताई सपकाल के निधन पर शोक जताया। गरीबी में पली-बढ़ीं सपकाल को बाल्यावस्था में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। 14 नवंबर, 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में जन्मी सपकाल को चौथी कक्षा पास करने के बाद स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 12 साल की छोटी सी उम्र में ही उसकी शादी 32 साल के एक शख्स से कर दी गई थी। तीन बच्चों को जन्म देने के बाद, उसके पति ने गर्भवती होने पर भी उसे छोड़ दिया। उसकी अपनी माँ और जिस गाँव में वह पली-बढ़ी थी, उसने मदद करने से इनकार कर दिया, जिससे उसे अपनी बेटियों की परवरिश करने के लिए भीख माँगनी पड़ी। सिंधुताई सकपाल ने अपनी इच्छाशक्ति से इन परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की और अनाथों के लिए काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए संस्थानों की स्थापना की। उन्होंने 40 वर्षों में एक हजार से अधिक अनाथ बच्चों को गोद लिया। पद्म पुरस्कार के अलावा, उन्हें 750 से अधिक पुरस्कार और सम्मान मिले। उसने पुरस्कार राशि का उपयोग अनाथों के लिए आश्रय बनाने के लिए किया। उनके प्रयासों से पुणे जिले के मंजरी में एक सुसज्जित अनाथालय की स्थापना हुई।

कविता पढ़ने के लिए नेवले से लड़ी सिंधुताई पूरे महाराष्ट्र में अनाथों की माता के रूप में जानी जाने वाली सिंधुताई की जीवन यात्रा बहुत कठिन थी. उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी कहानी खुद बयां की थी. उन्हीं के शब्दों में हम उनके संघर्षों की कहानी आपको बता रहे हैं- जब मेरी माँ को पता चला कि मैं घर में विद्रोह करके स्कूल जाना चाहती थी तो उन्होंने मेरी शादी करने का फ़ैसला किया. शादी के समय मैं दस साल की थी. मेरे पति की उम्र 35 साल थी. दुर्भाग्य से, मेरे पति को यह सहन नहीं था कि मैं पढ़ूं-लिखूं. वह शिक्षित नहीं थे. वे पढ़ नहीं सकते थे और उनकी पत्नी पढ़ सकती थी, इस बात पर उन्हें काफ़ी गुस्सा था, वे मुझे पढ़ते हुए देखना सहन नहीं कर पाते थे, मार-पीट करने लगते थे. उस वक़्त मैं किस तरह से पढ़ने की कोशिश करती? उन दिनों किराना दुकानों पर पर्ची मिलती थी, एक तरफ लिखा होता था, उसे पढ़ती और दूसरी तरफ के हिस्से पर लिखने की कोशिश करती, क्योंकि पढ़ने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था. ससुराल में हर वक़्त लोग मेरी निगरानी किया करते थे. मेरे पति से कहा जाता था कि तुम्हारी पत्नी काम नहीं कर रही है, पढ़ने का नाटक कर रही है. ऐसे माहौल में, मैं इन काग़ज़ों को घर के अंदर मौजू चूहे के बिल में छुपा देती थी. लेकिन जब चूहा अंदर जाता था तो वह कागज अंदर तक धकेल देता था. एक दिन मुझे घर में एक बड़ा चूहा दिखा और उसका बिल भी बड़ा था. लेकिन वह चूहे का बिल नहीं था, वह नेवला का बिल था. नेवला और सांप दुश्मनी के बारे में आप लोग जानते हैं. एक दिन मैंने एक काग़ज़ उसी नेवले के बिल में छिपा दिया. उस कागज पर मराठी के कवि गजानन दिगंबर माडगूलकर (गदीमा के नाम से मशहूर) की कविता थी. उस कविता का भाव कुछ ऐसा था कि औरतें जब पानी भरने के लिए घर से बाहर जाए, तब कुछ पढ़ना सीख लें, क्योंकि घर में तो पढ़ना संभव नहीं था.

नेवला ने सोचा कि ये काग़ज़ उसका दुश्मन है. जब मैंने काग़ज़ निकालने के लिए हाथ डाला उसने मेरे हाथ को सांप की तरह महसूस किया. उसने मेरे बाएं हाथ की छोटी ऊंगली पकड़ ली, आज भी मेरी उंगली टेढ़ी है. नेवला ने मेरी ऊंगली ना केवल काट ली बल्कि उसे पकड़ भी लिया लेकिन मैंने काग़ज़ नहीं छोड़ा. काग़ज़ के साथ ही मैंने नेवला बाहर निकाला. मुझे पढ़ने की भूख थी. उस कविता पर खून की धार टपक रही थी. तो पढ़ने के लिए एक तरह से नेवला के साथ लड़ाई भी की और अपना ख़ून भी बहाया. उनकी मां नहीं चाहती थी कि सिंधु ताई पढ़ें -लिखें तो वह उनको भैंस चराने के लिए भेजती थी. जब भैंस पानी में चली जाती थी तो सिंधु ताई पाठशाला चली जाती थी. लेकिन ऐसा करने में समय का ध्यान नहीं होता था, देर से स्कूल पहुंचने पर शिक्षकों से डांट सुननी पड़ती थी. एक दिन भैंस पानी से निकल कर किसी के खेत में चली गई, उस किसान ने स्कूल में आकर कहा कि उनकी फ़सल सिंधु ताई की भैंस चर गई है. तब वंदिले नामक शिक्षक को पढ़ाई के प्रति सिंधु ताई की रूचि और संघर्षों का पता चला। शिक्षक वन्दिले. सिंधुताई की लगन से प्रभावित हुए और उन्होंने बिना परीक्षा दिए ही सिंधु ताई को चौथी कक्षा में पास कर दिया था. जब पति ने मारपीट कर घर से निकाला , मैं 20 साल की थी। नाते रिश्तेदारों की कोई मदद नहीं मिली. पिता का निधन हो चुका था और मां ने भी घर में जगह नहीं दी. मेरी गोद में 10 दिन की बच्ची थी. मैं भीख मांगती थी, गाने गाती थी और जैसे तैसे रह रही थी. गाय-भैंस के बाड़े में रहते हुए संघर्ष शुरू किया था. मैंने वहीं से गोबर फेंकने के लिए मजदूरी पाने का संघर्ष किया था. मेरी मांग थी कि हम गोबर को एकत्रित करके जंगल में ले जाते हैं, हमें गोबर उठाने की मज़दूरी मिलनी चाहिए. उस समय वर्धा में रंगनाथन कलेक्टर थे उन्होंने मुझे न्याय दिया. मैंने उन्हें लिख कर शिकायत की थी कि हमें तनख्वाह नहीं मिलती, रंगनाथन कलेक्टर इस मांग पर सहमत हो गए और इस तरह हमें न्याय मिला था.

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