Opinion

सचमुच कमाल थे !

” अनित्यानि शरीराणि भवोनैव शाश्वतः
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्र्तव्यो धर्मसंग्रह “

सनातन धर्म की सुंदरता “वसुधैव कुटुम्बक” और समरसता में है और यही हुआ भी, जब वाराणसी में ‘कर्म को धर्म’ माननेवाले वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान के असामयिक निधन पर वहां के पत्रकारों ने विशेष पूजा कर कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए उन्हें दशाश्वमेध घाट पर श्रद्धांजलि दी। साथ ही, शुक्रवार की गंगा -आरती उनको समर्पित की गई। मृत व्यक्ति की जाति नहीं होती ,सब ईश्वर हो जाता है ,सबकुछ राममय हो जाता है। नई दिल्ली टेलीविजन ( एन डी टी वी ) का उत्तरप्रदेश ब्यूरो सम्भालनेवाले कमाल खान ने अपनी मृत्यु के बाद शास्त्रों की उपरोलिखित उक्ति की “सार्वभौमिकता और सर्वकालिकता ” को पुनः सिद्ध कर दिया।’आजतक’ के संस्थापक- सम्पादक सुरेंद्रप्रताप सिंह की मृत्यु के बाद शायद यह दूसरी घटना है जिसमें किसी पत्रकार के निधन ने हर पेशेवर पत्रकार को दुखी किया और वे रोये। किसी की कलम रोई तो किसी की कीबोर्ड पर उँगलियाँ थरथरायीं और किसी का कैमरा कांपा एवं उस कैमरे से जुड़ा माइक मौन हो गया।

कमाल खान के निधन से पसरे शोक में विचारधारा और प्रतिबद्धता का प्रश्न गौण हो गया। शायद पत्रकारिता की शुचिता के लिए संकल्पित और ‘समाचार के आचार’ को देखने -दिखाने के कर्तव्यों से बंधे सुरेंद्रप्रताप से लगायत कमाल खान जैसे पत्रकार अपने पीछे जो संस्कार गढ़कर छोड़ जाते हैं उससे ही शून्य गहराता है।एक ‘शून्य’ उनके न होने का और एक ‘शून्य’ उनके सृजे मुहावरों का शेष रह गए लोगों के पीछे चस्पा होने का। एक शून्य जो मन को बेधता है और वही शून्य जो मूल्य को बढ़ाता है। निधन के ठीक पहले उन्होने जो रिपोर्ट की थी वह उत्तर प्रदेश भाजपा में मची कथित भगदड़ की थी। सभी न्यूज चैनल चीख -चिल्ला रहे थे कि अखिलेश यादव राजनीति में मोदी -शाह -योगी को मात दे रहे हैं तब भगोड़े मंत्रियों और विधायकों का रिपोर्टकार्ड बांचने तथा उनके टिकट कटने का सच आंकड़ों और भाजपा के द्वारा कराये गए तीन सर्वे के आधार पर बताने का काम कमाल कर रहे थे। इस रिपोर्ट के बाद वे घर गए। सबकुछ सामान्य था। उसके बाद कमाल के हृदयाघात से परलोक सिधारने की खबर आयी।

मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि कमाल हमारी सम्प्रदाय के कबीर थे। कमाल ख़ान को एनडीटीवी ने मक्का-मदीना भेजा हज की रिपोर्टिंग केलिए ।वीजा लेने के लिए बताना पड़ता है कि वह हज ही करने जा रहे हैं , कुछ और नहीं। यहां कमाल ख़ान ने डिप्लोमेसी बरती और हज करना ख़ामोश रह कर बताया। फिर भी वीजा मिल गया। मक्का में क़ायदा है कि नमाज के समय अगर कोई नमाज नहीं पढ़ता तो उस का सिर क़लम कर दिया जाता है। पर कमाल ने रिस्क लिया और नमाज कभी नहीं पढ़ी और मक्का से लौट कर कमाल ने इस बारे में खुल कर सारे विवरण लिखे।

कमाल ख़ान की विनम्रता , सीखने और समझने की ललक उन्हें लगातार बड़ा बनाती गई। काम के प्रति उन का समर्पण देखते बनता था। पहले के दिनों में कमाल अकसर फ़ोन कर सबसे ख़बरों पर टिप लेते रहते थे। ख़बर कैसे और बेहतर हो सकती है , इस बारे में साथियों से भी पूछते रहते थे। एक बार किसी बात पर मायावती कमाल से नाराज हो गईं , कहा कि ‘यह रहेगा तो प्रेस कांफ्रेंस नहीं करुंगी’। कमाल बिना किसी विवाद के चुपचाप उठ कर चले गए। कई लोग जान भी नहीं पाए कि हुआ क्या। उन दिनों मायावती प्रेस कांफ्रेंस में सवाल सुनतीं थीं और जवाब भी देती थीं। अब तो खैर वह लिखित पढ़ कर चल देती हैं। कमाल की ख़ासियत यह थी कि वह कभी किसी से किसी विवाद में नहीं उलझते थे, इसीलिए सबके चहेते थे। वह मानते थे कि वक़्त ख़राब होता है इस सबसे,एनर्जी भी नष्ट होती है।

भाषा में अशिष्ट ना होने के संस्कार उन्हें लखनऊ ने ही दिये होंगे तभी तो वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन उन्हें याद करते लिखते हैं, “यूपी की राजनीति में नेताओं की अशिष्ट भाषा पर बात करते हुए उन्होंने एक लंबी खबर तैयार की. लगभग हर दल के नेता इस अशिष्टता में एक-दूसरे को मात देते दिख रहे थे। ख़बर के अंत में कमाल ख़ान ने इन सबकी भर्त्सना नहीं की ,केवल इतना कहा ” तहज़ीब के शहर लखनऊ से, शर्मिंदा मैं कमाल ख़ान.” अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर लेकिन हिन्दी, उर्दू में कमाल की कलम रशियन भाषा के जानकार। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी ने एक संदेश में लिखा “मुझे अच्छे से याद है जब 2007 में मायावती की सरकार का आरोहण हो रहा था तब कमाल खान ने कैमरे के सामने एक शेर कहा था: “इसके पहले यहां जो शख्स तख्त नशीन था, उसको भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीन था” भाषाई शुद्धता के परे उनमें सम हो जाना अद्भुत था।

हिंदी पत्रकारिता के इनसायक्लोपीडिया और कमाल के सहकर्मी रहे दयानन्द पांडेय कहते हैं “ऐसी सौभाग्यशाली मृत्यु भी कितनों को मिलती है भला कि रात रिपोर्ट पेश की और सुबह विदा हो गए। कमाल ख़ान वाकई बाकमाल थे। एच एल की नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता में आए थे। नब्बे के दशक में नवभारत टाइम्स , लखनऊ में हमारे साथी थे। कमाल और रुचि कुमार दोनों ही नवभारत टाइम्स में थे। वहीं उन की दोस्ती हुई। फिर हमसफ़र बन गए। नवभारत टाइम्स बंद होने के बाद जल्दी ही रुचि ने टी वी पर विनोद दुआ के ‘परख’ के लिए काम करना शुरु किया। कमाल रुचि के साथ उन की परदे के पीछे से मदद करते रहे। तब तक उनका विवाह नहीं हुआ था। फिर जल्दी ही दोनों इलेक्ट्रानिक मीडिया का चेहरा बन गए। दोनों दो ध्रुव चैनलों में काम करने लगे। कमाल एन डी टी वी में और रुचि इंडिया टी वी में। दोनों अपने-अपने चैनलों की पहचान बन गए।

” फॉलो अप” ख़बर में भी कमाल का जवाब नहीं था -याद करते हैं दयानन्द पांडेय ” एक बार वह शिलांग से वहां के फूलों के बाबत रिपोर्ट कर रहे थे। फ़ोन किया और बधाई दी कि शिलांग के फूलों पर इतनी शानदार रिपोर्ट पेश की। कुछ समय पहले मैं भी शिलांग गया था। कमाल को यह मालूम था। फिर वह वहां के बारे में भी मुझ से दरियाफ़्त करने लगे। मैंने बताया उन्हें कि परिवार सहित घूमने गया था , आप की तरह रिपोर्टिंग के लिए नहीं। कमाल हंसने लगे। बोले , मैं भी घूमने ही आया हूं। बस रिपोर्टिंग भी दी है।

एन डी टी वी रेजिडेंट एडिटर अनुराग द्वारी बताते हैं – ” सिमटते टीवी के कई दायरे हैं, उनमें से एक है कि राज्य के अलग-अलग ब्यूरो के साथी एक -दूसरे को टीवी पर देख पाते हैं, फोन से हालचाल पूछ लेते हैं पर मिल नहीं पाते…आज कमाल खान नहीं हैं, सबके अपने -अपने हिस्सों में कमाल खान मौजूद हैं। कई बातें हैं लेकिन व्हाट्सऐप पलटता हूं तो उनका ये मैसेज बार- बार देखता हूं, दो बार उन्होंने शिवरात्रि पर यही मैसेज भेजा एक गुज़ारिश के साथ कि मैं इसे पढूं.

महादेव:
जैसे-जैसे सूरज निकलता है,
नीला होता जाता है आसमान।
जैसे ध्यान से जग रहे हों महादेव।
धीरे-धीरे राख झाड़,उठ खड़ा होता है एक नील पुरुष।
और नीली देह धूप में चमकने तपने लगती है भरपूर।
शाम होते ही फिर से ध्यान में लीन हो जाते हैं महादेव।
नीला और गहरा….और गहरा हो जाता है।
हो जाती है रात।

कमाल ध्यान में नील हो गये, वो जानते थे कि मैं ईश्वर में अगाध आस्था रखता हूं सो कई दफे कई बातें कहते थे अनूठी और अलहदा। रवीश कुमार ने लिखा है “कमाल ख़ान दो मिनट की रिपोर्ट लिखने के लिए भी दिन भर सोचा करते थे.”.कमाल खान की रिपोर्टिंग में जो धैर्य था वो उनके व्यक्तित्व में भी था।लाइव पर उनको सुनना कभी बोझिल नहीं होता।उनका हर एक शब्द उनकी समझ, लगन, अध्ययन में पिरोया हुआ रहता था। वो जैसे दिखते थे, वैसे ही थे अनुशासित, समरसता के पैरोकार, समाज के हर वर्ग के लिये संवेदनशील ,सबके हिस्से उनकी कल की आख़िरी तस्वीर है जिसमें वो लैंगिक समानता की ही बात कर रहे थे।
कमाल की चुप्पी और मुस्कुराना भी उन का जवाब होता था। वह अकसर इसे आज़माते थे। कमाल पढ़ते बहुत थे।सीखने और समझने की उन की ललक ही उनकी बड़ी ताक़त थी। हिंदी , उर्दू , अंगरेजी सब पढ़ते पर वह साहित्य पढ़ते हैं, इसका प्रचार नहीं करते थे। कमाल ख़ान तकनीकी रुप से भी बहुत समृद्ध थे। अमूमन अपनी रिपोर्ट वह ख़ुद एडिट कर भेजते थे ताकि उस की कतर-व्यौत न हो। पुराने रिश्ते को वह निभाना जानते थे। कमाल ने एन डी टी वी में रहते हुए भी ख़बरों की दुनिया का नाम भी बहुत रोशन किया है। कमाल ख़ान असल में न्यूज़ चैनलों में न्यूज़ परोसने की एक कला का नाम हैं अब। ख़बरों को परोसने का जो सलीक़ा , जो तेवर और तुर्शी कमाल ख़ान ने छोड़ी है , अब वह एक मानक है। शायद ही कोई कमाल की खींची यह लंबी लकीर , छोटी कर पाए।

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