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अब मेडिकल छात्र ‘हिप्पोक्रेटिक शपथ’ की जगह लेंगे ‘चरक शपथ’

भारत में अब मेडिकल छात्र ‘हिप्पोक्रेटिक शपथ’ की जगह ‘चरक शपथ’ लेंगे। सालों पुरानी शपथ लेने की परंपरा में यह बड़ा बदलाव है.

बीते सोमवार को शीर्ष चिकित्सा शिक्षा नियामक राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने देश के सभी मेडिकल कॉलेजों के साथ वर्चुल बैठक की. इस बैठक में आयोग ने सुझाव दिया है कि डॉक्टरों के ग्रेजुएशन सेरेमनी के दौरान लिए जाने वाले ‘हिप्पोक्रेटिक शपथ’ को ‘चरक शपथ’ में बदल दिया जाए.   हिंदी भाषी राज्यों में शपथ हिंदी में ही होगी. अलग अलग क्षेत्रों की भाषा के मुताबिक यह शपथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी ली जा सकती है.  चरक शपथ’ का नाम आयुर्वेद के जनक माने जाने वाले महर्षि चरक के नाम पर रखा गया है.  

मेडिकल छात्रों को हिप्पोक्रेटिक शपथ दिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन अब यह खत्म होने जा रही है. 14 फरवरी से देश के मेडिकल कॉलेजों में शुरू हो रहे नए अकेडमिक सेशन में अब महर्षि चरक की देशी शपथ दिलाई जाएगी. प्राचीन भारतीय मान्यताओं के मुताबिक महर्षि चरक चिकित्सा विज्ञान में योगदान करने वालों में सबसे प्रमुख और श्रेष्ठ माने जाते हैं और चिकित्सा ग्रंथ ‘चरक संहिता’ के लेखक भी है. इसलिए अब नेशनल मेडिकल कमीशन ने डॉक्टरों को महर्षि चरक की शपथ दिलाने का फैसला किया है. इसके साथ ही सभी एमबीबीएस फ्रेशर्स को 10 दिन की योगा ट्रेनिंग भी अनिवार्य होगी.

‘हिप्पोक्रेटिक शपथ’ का इतिहास

हिप्पोक्रेटिक शपथ का इतिहास ढाई हजार साल पुराना है। 460 से 377 ईसा पूर्व के समय यूनान में हिप्पोक्रेट्स नाम के एक बहुत बड़े चिकित्सक हुए। उन्होंने डॉक्टरों के लिए कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत बताए। बाद में इन सिद्धांतों को डॉक्टरों के पेशे के लिए बाध्यकारी बना दिया गया। मेडिकल छात्रों को हिप्पोक्रेट्स के सिद्धांतों की शपथ दिलाई जाने लगी। इसे हिप्पोक्रेटिक शपथ का नाम दिया गया।

समय के साथ इस शपथ में कई बार संशोधन हुए। दुनिया के कुछ हिस्सों में मेडिकल कॉलेज इसके मूल रूप में लिखे सिद्धांतों (ग्रीक भाषा) का उपयोग करते हैं। वहीं कई जगहों पर जिनेवा घोषणा या मैमोनाइड्स की शपथ लेते हैं। दोनों ही हिप्पोक्रेट्स के बताए सिद्धांत पर आधारित हैं। तकरीबन दुनिया के सभी मेडिकल कॉलेज में इसी तरह की शपथ दिलाई जाती है।

आमतौर पर चिकित्सकों के द्वारा खुले तौर पर अन्य डॉक्टरों के साथ ज्ञान साझा करने के एक समझौते के साथ शुरू होती है, जिसका पालन उन्हें अपने पेशे में करना होता है. शपथ में चिकित्सक यह कसम लेते हैं कि वे अपने उपचार का प्रयोग मरीज की भलाई के लिए करेंगे, न कि उनके नुकसान के लिए. इस भाग में कोई हानि नहीं पहुंचाने की बात कही गई है. हालांकि, इसे काफी अलग तरह से कहा गया- ‘मैं रोगियों को ठीक करने के संबंध में अपने साधनों और सही निर्णय के आधार पर उनके लिए सबसे अच्छा आहार तैयार करूंगा और आदेश दूंगा, और मैं इस बात का ध्यान रखूंगा कि उन्हें कोई चोट या क्षति न पहुंचे.’

साथ ही इस शपथ में यह भी कहा जाता है कि डॉक्टर किसी को घातक दवा नहीं देंगे, न ही किसी को देने देंगे और गर्भपात नहीं करेंगे. हालांकि शपथ के इस हिस्से को कई जगहों पर हटा दिया गया है या फिर बदलती परिस्थितियों के अनुसार फिर से लिखा गया है. हिप्पोक्रेटिक शपथ के अगले हिस्से में लिखा है कि डॉक्टर अपनी सीमाओं को जानते हुए किसी विशेषज्ञ डॉक्टर को सर्जरी करने की पूरी अनुमति देंगे. शपथ में डॉक्टरों को अपनी स्थिति का फायदा उठाने पर भी रोक लगाई गई है, जिसके अनुसार चिकित्सक अपनी यौन इच्छाओं को पूरी करने  या किसी अन्य तरह की स्थिति का फायदा नहीं उठाने का शपथ लेते हैं.

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