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प्राचीन भारत के विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक:- भाग 1

विशेष माहिती श्रृंखला – (1-7)

  • भूमिका
[आधुनिक युग के विभिन्न वैज्ञानिक आविष्कारों का श्रेय पश्चिमी देशों को दिया जाता है। लेकिन यह धारणा पूर्णतया भ्रामक और अनुचित है। पश्चिमी देशों में बीते 500 वर्ष के दौरान जितने भी आविष्कार हुए, उनमें से अधिकांश भारत के प्राचीन ऋषियों के उत्कृष्ट वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित हैं।]

वेदों में ज्ञान-विज्ञान की बहुत सारी बातें हैं। आज का विज्ञान जो खोज रहा है वह पहले ही खोजा जा चुका है। बस फर्क इतना है कि आज का विज्ञान जो खोज रहा है उसे वह अपना आविष्कार बताता है।

भारत मे लोगों की यह धारणा है कि आधुनिक युग के विभिन्न वैज्ञानिक आविष्कार पश्चिमी देशों की देन हैं। कारण, आजादी के बाद से देश के स्कूली पाठ्यक्रम में यही पढ़ाया में जाता है, पर यह धारणा पूरी तरह भ्रामक व अनुचित है।

इस दिशा में देश-दुनिया में हुए शोध-अध्ययनों से यह तथ्य उजागर हुआ है कि बीते 500 वर्षों में पाश्चात्य देशों में हुए बिजली, पृथ्वी की गति, आकृति व गुरुत्वाकर्षण के नियम, परमाणु बम, विमान प्रौद्योगिकी, पारा व जस्त आदि विभिन्न धातुओं की खोज, गणित (खासकर बीजगणित व रेखागणित) तथा यांत्रिकी व शल्य चिकित्सा के जिन अनेकानेक आविष्कारों व अनुसंधानों का श्रेय यूरोपीय वैज्ञानिकों को दिया जाता है, वे भारत में सैकड़ों वर्ष पूर्व आविष्कृत हो चुके थे। भारत के विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, प्रो. बृजेंद्रनाथ सील, डॉ. जगदीश चंद्र बसु, राव साहब वझे व रामानुजम आदि ने इसे गहन अध्ययन व तर्कों से साबित किया है।

डॉ. प्रफुल्ल चंद्र राय की ‘हिंदू केमिस्ट्री’, बृजेंद्रनाथ सील की ‘दि पॉजिटिव साइंस ऑफ एनशिएंट हिंदूज’ तथा धर्मपाल जी की ‘इंडियन साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन एटीन्थ सेन्चुरी’ में प्राचीन व मध्ययुगीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों काउल्लेख है। इनमें स्पष्ट किया गया है कि आर्यकालीन भारत में खगोल, गणित, ज्योतिष, भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, , धातु व भवन निर्माण आदि क्षेत्रों में चहुंमुखी प्रगति हुई थी। जिस समय यूरोप में घुमक्कड़ जातियां बस्तियां बसाना सीख रही थीं, उस समय भारत में वैज्ञानिक प्रयोग, कृषि, भवन निर्माण, धातु-विज्ञान, वस्त्र निर्माण, परिवहन व्यवस्था आदि क्षेत्र अत्यंत उन्नत दशा में थे।

देश में विज्ञान की यह प्रगति यात्रा ईसा पूर्व 200 से ईसा के बाद लगभग 11वीं सदी तक आर्यभट, वराह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, बौधायन, चरक, सुश्रुत, अगत्स्य, नागार्जुन, भारद्वाज व कणाद जैसे भारतीय वैज्ञानिकों के उन्नत शोधों व आविष्कारों के साथ जारी रही।

भारत को ‘विश्व गुरु’ और ‘सोने की चिड़िया’ जैसे विशेषण यूं ही नहीं मिले थे। इसका मूल कारण था, हमारे ऋषि-मनीषियों का उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान, जिससे आकर्षित होकर पहले मुगल और कालांतर में अंग्रेज यहां खिंचे चले आए थे।

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