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आतंकवाद का हल केवल सनातन संस्कृति में ही निहित है

हाल ही के समय में न केवल भारत बल्कि विश्व के कई देशों यथा, स्वीडन, ब्रिटेन, फ्रांस, नार्वे, भारत, अमेरिका आदि में आतंकवाद की समस्या ने सीधे तौर पर इन देशों के आम नागरिकों को एवं कुछ हद्द तक इन देशों की अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभावित किया है। आतंकवाद के पीछे धार्मिक कट्टरता को मुख्य कारण बताया जा रहा है और आश्चर्य होता है कि पूरे विश्व में ही आतंकवाद फैलाने में एक मजहब विशेष के लोगों का अधिकतम योगदान नजर आ रहा है।

इसके कारण खोजने पर ध्यान जाता है कि इस मजहब विशेष की एक किताब में ही यह बताया गया है कि इन्हें इस्लाम के अलावा अन्य कोई धर्म बिलकुल स्वीकार नहीं है और इस्लाम को नहीं मानने वाले लोगों को इस पृथ्वी पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। अभी हाल ही में भारत के कई नगरों में रामनवमी एवं हनुमान जयंती पर हिंदू नागरिकों द्वारा निकाले गए देवी देवताओं के जुलूस पर पत्थरबाजी की गई है। इसकी शुरुआत राजस्थान के करौली से हुई फिर मध्य प्रदेश के खरगोन, कर्नाटक के हुबली, आंध्र प्रदेश के कुरनूल के होलागुंडा, उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के भगवानपुर के एक गांव, गुजरात के आणंद और हिम्मतनगर, पश्चिम बंगाल के बांकुरा आदि शहरों तक फैल गई। इन नगरों में पोलिस भी हालत को नियंत्रित करने में एक तरह से असफल रही है। इसी प्रकार अभी हाल ही में स्वीडन में भी हमलावर भीड़ (मुस्लिम शरणार्थियों) द्वारा पोलिस वाहनों पर हमला कर दिया गया एवं पोलिस की कई गाड़ियों को जला दिया गया।

अत्यधिक सूचना तंत्र और हथियारों से लैस पोलिस भी हालत को नियंत्रित करने में असफल रही। स्वीडन के साथ ही यूरोप के कई देशों में मुस्लिम शरणार्थी वहां की कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। उक्त कुछ घटनाओं का वर्णन तो केवल उदाहरण के तौर पर किया गया है अन्यथा आतंकवाद की स्थिति तो पूरे विश्व में ही बद से बदतर होती जा रही है एवं अब तो इन देशों की अर्थव्यस्थाओं को भी प्रभावित कर रही है। इन देशों में एक मजहब विशेष के लोगों द्वारा देश की सम्पत्ति को नुकसान तो पहुंचाया ही जाता है साथ ही पोलिस एवं आम नागरिकों पर भी हमले किए जाते है जिससे कई बार तो इन हमलों में पोलिस एवं आम नागरिक अपनी जान भी गवां देते हैं। इस प्रकार की लगातार बढ़ रही घटनाओं के चलते अब विश्व के आम नागरिक इन घटनाओं के कारणों के समझने लगे हैं एवं आतंकवादियों की धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध एक होने लगे हैं।

जैसे बताया जा रहा है कि अभी हाल ही में सूडान ने अपने देश में इस्लाम के अनुपालन पर प्रतिबंध लगा दिया है। यूरोप के कई देशों में वहां के नागरिक इस्लाम धर्म को त्याग कर अब ईसाई धर्म अपना रहे हैं। जापान ने भी इस्लाम धर्म का पालन करने वाले लोगों के लिए कड़े कानून लागू कर दिए हैं। चीन द्वारा मुस्लिम समाज पर लगातार किए जा रहे अत्याचारों से तो अब पूरा विश्व ही परिचित हो गया है। एक समाचार के अनुसार नार्वे ने एक बड़ी संख्या में इस्लाम मजहब को मानने वाले लोगों को अपने देश से निकाल दिया है, इस कदम को उठाने के बाद नार्वे में अपराध की दर में 72 प्रतिशत तक की कमी आ गई है एवं वहां की जेलें 50 प्रतिशत तक खाली हो गई हैं तथा पोलिस अब नार्वे के मूल नागरिकों के हितों के कार्यों में अपने आप को व्यस्त कर पा रही है। विश्व के कई अन्य देशों ने भी इसी प्रकार के कठोर निर्णय लिए हैं। कुछ अन्य देशों में तो वहां के नागरिकों द्वारा “मैं पूर्व मुस्लिम” नाम से आंदोलन ही चलाया जा रहा है जिसके अंतर्गत ये लोग घोषणा करने लगे हैं कि अब मैंने इस्लाम मजहब का परित्याग कर दिया है।

भारत वैसे तो हिंदू सनातन संस्कृति को मानने वाले लोगों का देश है और इसे राम और कृष्ण का देश भी माना जाता है, इसलिए यहां हिंदू परिवारों में बचपन से ही “वसुधैव कुटुम्बमक”, “सर्वे भवन्तु सुखिन:” एवं “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” की भावना जागृत की जाती है एवं इसी के चलते भारत ने अन्य देशों में हिंदू धर्म को स्थापित करने अथवा उनकी जमीन हड़पने के उद्देश्य से कभी भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया है। भारत में तो जीव, जंतुओं एवं प्रकृति को भी देवता का दर्जा दिया जाता है। परंतु हाल ही के समय में भारत में भी इस्लाम के अनुयायियों की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। विशेष रूप से वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से तो भारत में हिंदुओं की स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है।

आज भारत के 9 प्रांतो में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं एवं इस्लामी/ईसाई मतावलंबी बहुमत में आ गए हैं। जैसे, नागालैंड मे 8%, मिजोरम में 2.7%, मेघालय में 11.5%, अरुणाचल प्रदेश में 29%, मणिपुर में 41.4%, पंजाब में 39%, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में 32%, लक्षद्वीप में 2%, लदाख में 2% आबादी हिंदुओं की रह गई है। कुछ राज्यों में तो हिंदुओं की आबादी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। जिन जिन क्षेत्रों, जिलों अथवा प्रदेशों में इस्लाम को मानने वाले अनुयायियों की संख्या बढ़ी है उन उन क्षेत्रों, जिलों एवं प्रदेशों में हिंदुओं द्वारा निकाले जाने वाले धार्मिक जुलूसों पर पत्थरों से आक्रमण किया जाता है एवं हिंदुओं को हत्तोत्साहित किया जाता है ताकि वे अपने धार्मिक आयोजनों को नहीं कर पाएं।

भारत के हाल ही के इतिहास पर यदि नजर डालें तो आभास होता है कि जब जब देश के कुछ इलाकों में हिंदुओं की संख्या कम हुई है तब तब या तो देश का विभाजन हुआ है अथवा उन इलाकों में शेष बचे हिंदुओं को या तो मार दिया गया है या हिंदुओं को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया है अथवा उन इलाकों से हिंदुओं को भगा दिया गया है।  जैसे वर्ष 1947 में पाकिस्तान, वर्ष 1971 में बंगला देश, वर्ष 1990 में जम्मू एवं काश्मीर में इस प्रकार की दुर्घटनाएं हिंदुओं के साथ घट चुकी हैं। इसके बाद भी मामला यहां तक रुका नहीं है बल्कि गोधरा, मुंबई, अक्षरधाम, नंदीग्राम, दिल्ली आदि शहरों में आतंकवादी हमले किए गए हैं।

आज केरल, बंगाल, उत्तर प्रदेश के कुछ जिले, दिल्ली के कुछ इलाके इसी आग में जल रहे हैं। जबकि हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि बर्मा, श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि भी कभी भारत के ही भाग रहे हैं। भारत के अलावा भी अन्य देशों में ईसाई, बौध, हिंदू धर्म के अनुयायियों पर लगातार हमले करके इन देशों को इस्लामी राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया गया है जैसे, अफगानिस्तान, ईरान, लेबनान, सिल्क रूट के लगभग सभी देश, तुर्की, मध्य पूर्व, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका और बाकी अफ्रीका। इस प्रकार आज पूरे विश्व में इस्लाम को मानने वाले देशों की संख्या 57 हो गई है।

भारतीय चिंतन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार स्तंभों पर स्थापित है। इस दृष्टि से चाहे व्यक्ति हो, परिवार हो, देश यो अथवा विश्व हो, किसी के भी विषय में चिंतन का आधार एकांगी न मानकर एकात्म माना जाता है। भारत के उपनिषदों, वेदों, ग्रंथों में भी यह बताया गया है कि मनुष्य का जीवन अच्छे कर्मों को करने के लिए मिलता है एवं देवता भी मनुष्य के जीवन को प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। अच्छे कर्म कर मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है इसीलिए भारतीय धरा को कर्मभूमि माना गया है जबकि अन्य धराओं को भोगभूमि कहा गया है। साथ ही, वर्णाश्रम व्यवस्था हिंदू सनातन संस्कृति का मूल बताया जाता है।

हमारे शास्त्रों में यह भी वर्णन मिलता है कि सभी वर्णों तथा आश्रमों में पूर्णतः प्रतिष्ठित व्यक्ति जीवन के सर्वोत्तम लक्ष्य अर्थात मोक्ष को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है। अन्य धर्म, भोग को बढ़ावा देते हैं जबकि हिंदू सनातन संस्कृति योग को बढ़ावा देती है। इस प्रकार हिंदू धर्म के शास्त्रों, पुराणों एवं वेदों में किसी भी जीव के दिल को दुखाने अथवा उसकी हत्या को निषिद्ध बताया गया है जबकि अन्य धर्म के शास्त्रों में इस प्रकार की बातों का वर्णन नहीं मिलता है। इसी कारण के चलते हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायी बहुत कोमल स्वभाव एवं पूरे विश्व में निवास कर रहे प्राणियों को अपने कुटुंब का सदस्य मानने वाले होते हैं। बचपन में ही इस प्रकार की शिक्षाएं हमारे बुजुर्गों द्वारा प्रदान की जाती हैं। इसका प्रमाण भी इस रूप में दिया जा सकता है कि पूरे विश्व में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां इस्लाम मजहब को मानने वाले लगभग सभी फिरके पाए जाते हैं।

ईरान में मूल रूप से पारसी निवास करते थे, आज ईरान में केवल इस्लाम के अनुयायी ही पाए जाते हैं और पारसी उनके मूल देश में ही निवासरत नहीं हैं जबकि भारत में पारसी अच्छी संख्या में निवास कर रहे हैं। इसी प्रकार जब इजराईल पर इस्लाम के अनुयायियों का हमला हुआ था तब वहां के मूल निवासी यहूदी भी भारत में आश्रय लेने के उद्देश्य से आए थे और आज भारत में भी यहूदी बिना किसी भेदभाव के आनंद पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। विश्व के लगभग सभी धर्मों के विभिन्न फिरकों के अनुयायी भारत में भाई चारा निभाते हुए प्रसन्नता पूर्वक निवास कर रहे हैं।  इसी कारण से अब वैश्विक स्तर पर यह विश्वास बनता जा रहा है कि विश्व में तेजी से फैल रहे आतंकवाद का हल केवल हिंदू सनातन संस्कृति में ही दिखाई देता है।

– प्रहलाद सबनानी

सौजन्य : सा. विवेक हिंदी

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