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वनवासियों को सचेत हो अपने इतिहास को सामने लाना होगा : हर्ष चौहान

मुंबई।राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हर्ष चौहान ने वनवासियों से अपना संकोची स्वभाव छोड़कर अपने पूर्वजों का इतिहास संकलित कर उससे शेष विश्व का परिचय कराने का आह्वान किया।उन्होने कहा कि इस देश के वनवासियों ने कभी किसी का आधिपत्य नहीं स्वीकारा। हजारों वर्षों का इतिहास साक्षी है कि देश के विभिन्न राजाओं ने भी वन पर अधिकार का प्रयास कभी नहीं किया लेकिन अंग्रेजों ने वनवासियों का अन्य भारतीयों से संपर्क तोड़ने और उनको जंगलों से भी भगाने के लिए फारेस्ट एक्ट लागू किया। अंग्रेज सरकार ने मानगढ़ हिल्स में तीन तरफ से अंधाधुंध गोलियाँ चलवाकर १५०० भीलों का नरसंहार किया लेकिन उनके रिकार्ड्स से यह तथ्य लुप्त कर दिया गया।

जो लोग जनजातीय विषय पर शोध कर रहे हैं या उस पर शोध करना चाहते हैं उन्हें मानववंश शास्त्रीय अध्ययन को विस्तार देना होगा और जनजातीय के वेशभूषा -नृत्य आदि से आगे बढ़कर उनके जीवन तथा इतिहास का गंभीर अध्ययन करना होगा। श्री चौहान आज मुंबई विश्वविद्यालय तथा राष्ट्रीय जनजातीय आयोग द्वारा ‘ स्वतंत्रता संग्राम में जनजाति नायकों का योगदान ‘ विषय पर आयोजित समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होने कहा कि देश में लगभग १२ करोड़ वनवासी हैं जिनमें लगभग ३ करोड़ भील हैं किन्तु उनकी भागीदारी उच्च शिक्षा तथा शोध कार्यों में संतोषजनक नहीं है।शिक्षा लेने का लक्ष्य नौकरी और आजीविका न हो तथा वह हमें अपने समाज की अस्मिता -अस्तित्व एवं विकास के लिए प्रेरित करे तभी उसकी सार्थकता है। हमें अपने गावों पर गर्व करना सीखना होगा तभी हम सही अर्थों में विकसित होंगे।

इस अवसर पर मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति सुहास पेंडेकर ने अपने सम्बोधन में कहा कि मुंबई विश्वविद्यालय अनुसूचित जनजातियों के इतिहास तथा संस्कृति के लिए शोधकार्यों को बढ़ावा देगा और इसके लिए विद्यार्थियों तथा शोधकर्ताओं को आवश्यक सहायता भी देगा।उन्होने नई शिक्षा नीति की प्रशंसा करते हुए कहा कि इससे शिक्षा ज्ञान के प्रसार और विकास के अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगी।

इससे पहले विषय प्रस्तुत करते हुए श्री रविकांत सांगुले ने कहा कि स्वाभिमान एवं स्वायत्तता के लिए जनजातियों ने सदैव सबसे पहले अस्त्र उठाये और उन्होने किसी का भी आधिपत्य नहीं स्वीकारा। उनके लिए स्वामी रामदास ने आदर्शवाक्य दिया है ‘ अपने धर्म के लिए लड़ो और लड़ते -लड़ते अपनी भूमि वापस ले लो ‘ आचार्य शरद शेळके ने मुख्य वक्ता के रूप में स्वाधीनता संग्राम में जनजातीय नायकों के योगदान को रेखांकित करते हुए रोहतासगढ़ की जनजातीय महिलाओं द्वारा पुरुष वेश धारण कर पठानों को युद्धक्षेत्र में धूल चटाने की घटना का वर्णन कर पूरे सभागृह को रोमांचित कर दिया। उन्होने १८२७ से लेकर कारगिल युद्ध तक के जनजातीय वीरों का उल्लेख कर सभागृह में उपस्थित विद्यार्थियों को चुनौती दी कि वे भगवान बिरसा मुंडा के द्वारा बताए गए तीन प्रकार के शत्रुओं की पहचान करें और इतिहास संकलन भी करें।
आचार्य मिलिंद दांडेकर ने जनजातीय कल्याण के कार्यों में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग की भूमिका का वर्णन किया और इससे सम्बंधित एक वीडियो का भी प्रदर्शन किया।

समारोह के अंत में श्री हर्ष चौहान ने विद्यार्थियों और शिक्षकों के विभिन्न प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

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