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तिरंगे को सर्वोपरि बतानेवाले नवीन जिंदल के शिक्षण संस्थान में भारतविरोधी पढ़ाई

कांग्रेसी सांसद रहे नवीन जिंदल द्वारा स्थापित ‘ओ पी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी‘ इन दिनों जे एन यू की राह पर है।वहां के शिक्षक खुलेआम भारत विरोधी गतिविधियों में लीन हैं और वहां के पाठ्यक्रम पाकिस्तान समर्थक लोगों द्वारा तय किये जा रहे हैं। इसकी दीवारें ‘ भारत और हिन्दू विरोधी पोस्टरों ‘ और चे ग्वेरा के नारों से अटी हुई हैं।वहां पढ़नेवाले विद्यार्थियों के मन में देश के प्रति दुर्भावनाएं घर कर रही हैं और यह सब उस नवीन जिंदल द्वारा गढ़े संस्थान में हो रहा है जो यह कहते नहीं अघाते कि ” राष्ट्रध्वज देश के गौरव का सबसे बड़ा चिन्ह है और मैं उसको हमेशा ऊंचा लहराता देखना चाहता हूँ।देश सर्वोपरि है। ” बता दें कि उद्योगपति एवं पूर्व सांसद नवीन जिंदल इसके कुलपति हैं और इस यूनिवर्सिटी की स्थापना उन्होने २००९ में सोनीपत में की थी। इसकी गिनती विश्व के ५०० प्रमुख विश्वविद्यालयों में होती है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें ओ पी जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के शिक्षक अरिजीत घोष कहते हुए दिख रहे हैं कि वे मानते हैं ,जम्मू – कश्मीर पर भारत ने जबरन कब्जा किया हुआ है और उसे ‘भारत के कब्जे का जम्मू -कश्मीर कहना चाहिए। ऐसे ही शिक्षकों के कारण विद्यार्थियों के भीतर अलगाववादी भावनाएं उत्पन्न होती हैं और वे ‘ आज़ादी ‘ के नारे लगाने लगते हैं। यह विधि विद्यालय पहले भी पाठ्यक्रम में पकिस्तान समर्थक लेखकों की पुस्तकें शामिल किये जाने के कारण पहले भी विवादों में घिरता रहा है। इसके द्वारा विद्यार्थियों के मन में पृथकतावादी भावनाएं बढ़ती हैं।

जिंदल लॉ स्कूल के पाठ्यक्रम में निताशा कौर की लिखी पुस्तक ‘Kashmir: A place of blood and memory” को सम्मिलित किया गया है और विद्यार्थियों से उसको पढ़ने के लिए कहा जाता है। निताशा पकिस्तान समर्थक है और कहती हैं की भारत ने आक्रमण करके कश्मीर पर कब्ज़ा किया हुआ है। भारत का कश्मीर पर कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। इसी तरह प्रतापभानु मेहता , जीन द्रेज , क्रिस्टोफर जेफ़रलोट और अन्य भारत के विरुद्ध विषवमन करनेवाले लेखकों की पुस्तकें उनको पढ़ाई जा रही हैं। इसलिए ‘फासिस्ट भारत ‘से कश्मीर को मुक्त करने के पोस्टर्स ओ पी जिंदल यूनिवर्सिटी में देखकर अचरज नहीं होता। एक पोस्टर में लिखा है -‘ combat Indian colonial propaganda! End the militant occupation of Kashmir” अर्थात ‘भारत के औपनिवेशिक प्रचार का प्रतिरोध करो ! कश्मीर से सैनिक शासन समाप्त करो !!’


जब ये लोग भारत से कश्मीर की मुक्ति की बात करते हैं तो निश्चय ही यह कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार की लीपापोती का प्रयास है। वर्ष १९८३ में वामपंथी राजनीती के कारण जे एन यू समाचारों में था और वहां यह विचारधारा इतने उग्र रूप में फैली कि एक वर्ष तक यूनिवर्सिटी को बंद करना पड़ा था। उस समय राष्ट्रवादी विचारों वाले लोग जे एन यू परिसर में प्रवेश भी नहीं कर सकते थे। उस हिंसा में वामपंथी शिक्षक भी सम्मिलित थे। उसके बाद जे एन यू में पारा मिलिट्री फ़ोर्स तैनात करनी पडी थी।जिंदल विश्वविद्यालय आज उसी रह पर चलता दिख रहा है। पर वह अकेला नहीं है। राष्ट्रविरोधी तत्व टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज , जामिया मिलिया ,जाधवपुर विश्वविद्यालय में भी आसमान सर पर उठाये हुए हैं जिसको ठीक करने के लिए केंद्र सरकार को कदम उठाने चाहिए।

ये पोस्टर हमारे देश की शिक्षा पद्धति की विफलता का प्रमाण हैं जो भारतीय संस्कृति और रिलिजन के बारे में कुछ नहीं सीखा रही हैं तथा राष्ट्रवाद और राष्ट्रगौरव भी हमारे भीतर पैदा नहीं कर पा रही हैं। यह स्थिति लगभग सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में ऐसे अध्याय देखे जा सकते हैं,विशेषकर इतिहास और राजनीति शास्त्र में।

विद्यालयीन शिक्षा स्तर पर ही ऐतिहासिक तथ्यों को या तो तोड़- मरोड़कर या फिर गलत और अनेक सन्दर्भों में विपरीत लेखन से शिक्षा को दूषित किया गया है। यु जी सी के इतिहास पाठ्यक्रम में इस तरह की गड़बड़ियों ने अनेक शिक्षाशास्त्रियों को चिंतित किया है। ऐसी गड़बड़ियों को शीघ्रातिशीघ्र सुधारने की आवश्यकता है।इन विषयों में शीघ्र हस्तक्षेप की आवश्यकता है ,चाहे वह निजी शिक्षण संस्थान हों या सरकारीसभी के पाठ्यक्रम में एकरूपता आवश्यक है। चूँकि हमारे देश की शिक्षण व्यवस्था पर वामपंथियों का कब्ज़ा था जिन्होंने तथ्यों को गलत ढंग से परोसकर शिक्षा व्यवस्था को दूषित करते हुए हमारी पीढ़ियों को भारतीयता से दूर करने का काम किया है। आवश्यकता है कि पाठ्यक्रमों में संशोधन करके भारतीय मूल्यों को स्थापित किया जाय।

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