Opinion

मंदार में हैं दो सप्तर्षि मंडल

चौंकिए मत! मंदार पर्वत 16 चोटियों से मिलकर बना है। प्रमुख पर्वत सबसे ऊंची चोटी है जिस पर स्थित शीर्ष का मंदिर नीचे से दिखाई पड़ता है। यह सम्पूर्ण पर्वत विलक्षणता लिए हुए है।

इस पर्वत की चोटियों का एयरव्यू देखने से पता चलता है कि यहां दो सप्तर्षि मंडल हैं। दोनों सप्तर्षि मंडल पश्चिम से पूरब की ओर है अर्थात दोनों का लगभग चौकोर वाला सिरा पश्चिम में है और पूंछ (ऋषि मरीचि) वाला पूरब में। हाँ, उसी सप्तर्षि मंडल का प्रारूप जिसे आप आकाश में तारों के साथ देखते हैं।

बात यह है कि आर्मेनियन इंजीनियर और यहां एएसआई के इतिहासकार के रूप में मान्य जे डी बेग़लर (J.D. Begler) ने सन 1872 में मंदार पर्वत का दौरा किया था। पर्वत की सबसे ऊंची चोटी के ऊपर से उन्होंने यहां की 16 चोटियों का रेखांकन बनाया।

इस रेखांकन को गौर से देखें तो पाएंगे कि इसमें सप्तर्षि मंडल के तारों के सदृश पहाड़ियों के शीर्ष दृष्टिगोचर होते हैं।

खगोल विज्ञान कहता है कि पृथ्वी के घूर्णन के कारण धरती से सप्तर्षि मंडल भी चक्रवत घूमती प्रतीत होती है। किंतु इस प्रक्रिया को देखने के लिए पूर्व अध्ययन की आवश्यकता होती है। अगर इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी अपने अक्ष पर एंटी क्लॉकवाइज़ घूमती है।

ध्रुवतारा को अगर केंद्र मान लें तो प्रत्येक तीसरे माह में यह सप्तर्षि मंडल घड़ी की दिशा में घूमता प्रतीत होता है। वसंत ऋतु में यह मंदार पर उभरी हुई आकृति में नज़र आता है तो शिशिर ऋतु में प्रश्नवाचक चिह्न की तरह खड़ा। शरद ऋतु में यह वसंत के ठीक विपरीत किन्तु पश्चिम की ओर पूंछ (मरीचि ऋषि के रूप में ज्ञात) किए घड़ी की दिशा में अनवरत चलते हुए ग्रीष्म ऋतु में उल्टा प्रश्वाचक चिह्न की तरह नज़र आता है। कहते हैं कि हमारे ऋषियों ने स्वास्तिक की रचना इसी आधार पर किए हैं।

विलक्षण यह है कि शास्त्रों के अनुसार इस घूर्णन की दिशा के उत्तर की ओर भूमि और दक्षिण की ओर जल है। मंदार की अवस्थिति को देखें तो यह हिमालय पर्वत के दक्षिण में है और समुद्र से उत्तर की ओर। यहां भी यह सुयोग बैठता है कि मंदार पर सप्तर्षि मंडल के प्रतिरूप की उत्तर दिशा में नदियां तो हैं मगर उत्तरी गोलार्द्ध तक भूमि अधिकतम है। इस प्रतिरूप के दक्षिण में दक्षिणी गोलार्द्ध तक समुद्र फैला है।

इन दोनों सप्तर्षि प्रतिरूपों को देखें तो ऐसा महसूस होता है कि ये घड़ी की घूर्णन दिशा में गतिशीलता प्रदर्शित कर रहे हैं। इस विलक्षणता को बेग़लर ने भी गौर नहीं किया किन्तु इसके संबंध में ग्रीक लेखकों में मेगास्थनीज़ से लेकर प्लूनी द ग्रेट ने भी लिखा है। उसे फिर कभी के लिए छोड़ते हैं।

अब लगता है कि यूँ ही आर्ष मनीषियों ने मंदार पर्वत को पवित्र नहीं माना है!

प्रोफाईल चित्र  : जे डी बेग़लर का मूल स्केच। इसे समझने के लिए यह डिजिटल प्रारूप तैयार किया गया है।

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