Opinion

लोकमान्य तिलक पर ‘स्मृति श्रृंखला’ की आवश्यकता क्यों ?

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जीवित होते तो आज हम उनकी १६७ वीं जयन्ती मना रहे होते और वे १६६ वर्षों का अनुभव हमसे बाँट रहे होते। राष्ट्रपिता के रूप में विख्यात महात्मा गांधी उनको अपना गुरु मानते थे तो वीर सावरकर जैसे अथक योद्धा ने तिलक के चरणों में बैठकर ही ‘राष्ट्रधर्म की सर्वोच्चता’ का दर्शन किया था।

बाल गंगाधर तिलक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और पूर्ण स्वराज्य की वकालत करने वाले राष्ट्रवादी नेता, आन्दोलनकारी, शिक्षक थे।भारतीय जनता में राष्ट्रवाद का भाव पैदा करने वाले लोकमान्य तिलक को हिन्दू राष्ट्रवाद का अग्रदूत भी कहा जाता हैं।बाल गंगाधर तिलक पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने कहा था कि भारतीयों को विदेशी शासन के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए। उनके द्वारा शुरू की गई राजनीतिक गतिविधियों, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और सत्याग्रह को बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी ने अंग्रेज़ों के साथ अहिंसक असहयोग आंदोलन में अपनाया।

उन्होने स्वदेशी आंदोलन का प्रारम्भ किया था और भारतीय वांग्मय को शिक्षा का अंग बनाने की दिशा मेंम महत्वपूर्ण कार्य किये। उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी सरकारी नौकरी नहीं करेंगे तथा नई पीढ़ी को सस्ती एवं अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए निजी उच्च विद्यालय और महाविद्यालय चलाएँगे। सन १८८५ ई. में ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के तत्वावधान में ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ की स्थापना की।


उन्होंने दो साप्ताहिक समाचार पत्रों, मराठी में’ केसरी’ और अंग्रेज़ी में ‘द मराठा’, के माध्यम से लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम शुरू किया।तिलक ने प्लेग की बीमारी के दौरान देशवासियों की जो सेवा की, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता। जैसे ही पूना में प्लेग के लक्षण प्रकट हुए उन्होंने ‘हिन्दू प्लेग अस्पताल’ शुरू किया और कई दिनों तक इसके लिए धन जुटाने का कार्य किया।.आज जबकि अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों के पीछे भागते हैं और अपनी उद्यमिता के सुनहरे वर्ष अनुत्पादक काम करते हुए बिता देते हैं बाल गंगाधर तिलक का जीवन ,’ सरकारी नौकरियों के मोह से मुक्त होकर’ विभिन्न संस्थानों की स्थापना करते हुए दूसरों के लिए आजीविका का सृजन करने और समाज को दिशा देने की प्रेरणा देता है। इस कारा की जंजीरें तोड़ने के लिए आवश्यक है कि प्रेरणापुंज लोकमान्य तिलक के जीवन और कृतियों को श्रृंखलाबद्ध रूप से पाठकों के सामने लाया जाय ताकि हम स्वावलम्बी स्वदेशी समाज की रचना कर सकें। हम आगामी १ अगस्त तक लोकमान्य तिलक को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए लेखमाला शुरू कर रहे हैं।

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