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भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम,पाश्चात्य शिक्षण से ‘हीनता’बढ़ती है:लोकमान्य तिलक

तिलक के खोज के परिणामों को समझने में काफी समय लगेगा : डॉ ब्लूमफील्ड

लेख एवं छायाचित्र: राजेश झा

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के घोर आलोचक थे। वे मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है।उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति भारतीयों में अपनी संस्कृति के प्रति हीन भावना उत्पन्न करती है और अंग्रेजी शासन की क्रूरता के प्रति उन्हें सहनशील बनाती है। तिलक ने सिद्ध कर दिया था कि भारतीय शिक्षा अधिक वैज्ञानिक – तार्किक और समृद्ध है।उन्होने ज्योतिष को भी अध्ययन का विषय बनाया और कालांतर में ‘तिलक पंचांग’ का प्रकाशन शुरू किया।मैक्समूलर , वेबर, जेकोबी ,विटने समेत अनेक यूरोपीय और अमेरिकी विद्वान अपने समकालीन भारतीय लेखक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की विद्वत्ता का लोहा मानते थे।

पाश्चात्य शिक्षा को आधुनिक और वैज्ञानिक तथा भारतीय शिक्षा पद्धति को उनकी तुलना में बेकार माननेवाले ‘अधकचरे तथा आत्महीनताबोध ‘ से ग्रसित लोगों को जानना चाहिए कि भारतीय वैदिक शिक्षा की वैज्ञानिकता को जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपनी पुस्तकों ‘दि ओरायण रिसर्चेज इनटु द एंटिक्विटी ऑफ वेदाज़’ ,’ द आर्कटिक होम इन दि वेदाज’ और ‘गीता रहस्य ‘ द्वारा पुनर्स्थापित किया तो उनके समकालीन यूरोप और अमेरिका के अनेक विद्वानों ने डेंटनअपने दांतों तले उँगलियाँ दबा ली थी। लोकमान्य ने सिद्ध कर दिया था कि भारतीय शिक्षा अधिक वैज्ञानिक – तार्किक और समृद्ध है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी’ के ‘डॉ. ब्लूमफील्ड’ ने तिलक की पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा था ” निस्संदेह यह पुस्तक साहित्य के क्षेत्र में सनसनी पैदा करने वाली है। तिलक की खोज के परिणामों को समझने में काफ़ी समय लगेगा।”


उन्होंने ऋग्वेद के संपूर्ण संस्करण की सहायता से मनुष्य जाति के आदिकालीन इतिहास से संबंधित भूविज्ञान और पुरातत्त्व की नवीनतम खोज़ों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष दिया कि वैदिक ऋषियों के पूर्वज हिमानी युग में उत्तर ध्रुवीय क्षेत्र में रहते थे।अमेरिका के प्रो. विटने ने सन् 1894 ई. में अपनी मृत्यु से कुछ पहले ‘जर्नल ऑफ दि अमरीकन ओरिएंटल सोसाइटी’ में एक लेख लिख कर तिलक के सिद्धांतों की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इसी तरह ‘जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी’ के ‘डॉ. ब्लूमफील्ड’ ने एक वार्षिकोत्सव में भाषण करते हुए तिलक की पुस्तक की प्रशंसा इन शब्दों में की थी-” निस्संदेह यह पुस्तक साहित्य के क्षेत्र में सनसनी पैदा करने वाली है। तिलक की खोज के परिणामों को समझने में काफ़ी समय लगेगा।” डॉ. एफ. डब्ल्यू. वारेन , मैक्समूलर , वेबर, जेकोबी और विटने भी लोकमान्य तिलक की विद्वत्ता का लोहा मानते थे।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के घोर आलोचक थे। वे मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है।उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति भारतीयों में अपनी संस्कृति के प्रति हीन भावना उत्पन्न करती है और अंग्रेजी शासन की क्रूरता के प्रति उन्हें सहनशील बनाती है।इस स्थिति को बदलने के लिए उन्होने संकल्प लिया कि वे कभी सरकारी नौकरी नहीं करेंगे तथा नई पीढ़ी को सस्ती एवं अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए निजी उच्च विद्यालय और महाविद्यालय चलाएँगे। वे गणित और ज्योतिष को विज्ञान की शाखा और सांस्कृतिक इतिहास को भी शिक्षा का अनिवार्य अंग मानते थे।उन्होने ज्योतिष को भी अध्ययन का विषय बनाया और कालांतर में ‘तिलक पंचांग’ का प्रकाशन शुरू किया।
लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक जीवन १८८० में एक शिक्षक और शिक्षक संस्था के संस्थापक के रूप में शुरू किया। उन्होने २ जनवरी, सन् १८८० को पूना में ‘न्यू इंग्लिश स्कूल’ शुरू कि जिसने शीघ्र ही पुणे के विद्यालयों में में पहला स्थान प्राप्त कर लिया। प्राध्यापक के रूप में तिलक अत्यंत लोकप्रिय थे। वे गणित के स्थायी प्रोफेसर थे और बीच-बीच में संस्कृत तथा विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में भी कार्य करते थे। मौलिकता और एक-एक बात का ध्यान रखना उनका आदर्श वाक्य था और वे जो भी विषय पढ़ाते थे उसमें उनके छात्रों को कभी भी शिकायत करने का अवसर नहीं मिलता था। गणितज्ञ के रूप में उनका जवाब नहीं था और वे अपने छात्रों को अक्सर ‘डेक्कन कॉलेज’ के ‘प्रो. छत्रे’ की याद दिलाते थे, जो तिलक के गुरु भी थे। इसके साथ ही तिलक ने क़ानून की कक्षा शुरू की जो छात्रों को हाईकोर्ट और वक़ालत की परीक्षा के लिए तैयार करने वाला ‘बंबई प्रेसीडेंसी’ में अपने ढंग का पहला शैक्षणिक संस्थान था।


सन् १८८४ के उत्तरार्ध में उन्होंने संस्थाओं को क़ानूनी अस्तित्व देने का निश्चय किया और इस उद्देश्य के लिए ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’, पूना का गठन किया और वे इस सोसाइटी के पहले आजीवन सदस्य बने। सन १८८५ ई. में ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के तत्वावधान में ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ की स्थापना की । उन्होंने ‘गद्रेवाड़ा’ और ‘कबूतरखाना खेल का मैदान’ ख़रीद लिया। सर जेम्स फ़र्गुसन की सरकार के वायदे के अनुसार बाद में लॉर्ड रे ने सोसाइटी को नानावाड़ा सौंप दिया। सोसाइटी ने ‘चतुरश्रृंगी’ के समीप महाविद्यालय के लिए एक भव्य इमारत का निर्माण किया। बाल गंगाधर तिलक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और पूर्ण स्वराज्य की वकालत करने वाले राष्ट्रवादी नेता, आन्दोलनकारी, शिक्षक थे।भारतीय जनता में राष्ट्रवाद का भाव पैदा करने वाले लोकमान्य तिलक को हिन्दू राष्ट्रवाद का अग्रदूत भी कहा जाता हैं। .आज जबकि अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों के पीछे भागते हैं और अपनी उद्यमिता के सुनहरे वर्ष अनुत्पादक काम करते हुए बिता देते हैं बाल गंगाधर तिलक का जीवन ,’ सरकारी नौकरियों के मोह से मुक्त होकर’ विभिन्न संस्थानों की स्थापना करते हुए दूसरों के लिए आजीविका का सृजन करने और समाज को दिशा देने की प्रेरणा देता है।
तिलक जी ने स्कूल के भार से स्वयं को मुक्त करने के बाद अपना अधिकांश समय सार्वजनिक सेवा में लगाने का निश्चय किया। अब उन्हें थोड़ी फुरसत मिली थी। इसी समय लड़कियों के विवाह के लिए सहमति की आयु बढ़ाने का विधेयक वाइसराय की परिषद के सामने लाया जा रहा था। तिलक पूरे उत्साह से इस विवाद में कूद पड़े, इसलिए नहीं कि वे समाज-सुधार के सिद्धांतों के विरोधी थे, बल्कि इसलिए कि वे इस क्षेत्र में ज़ोर-जबरदस्ती करने के विरुद्ध थे। सहमति की आयु का विधेयक, चाहे इसके उद्देश्य कितने ही प्रशंसनीय क्यों न रहे हों, वास्तव में हिन्दू समाज में सरकारी हस्तक्षेप से सुधार लाने का प्रयास था। अत: समाज-सुधार के कुछ कट्टर समर्थक इसके विरुद्ध थे। इस विषय में तिलक के दृष्टिकोण से पूना का समाज दो भागों, कट्टरपंथी और सुधारवादियों में बँट गया। दोनों के बीच की खाई नए मतभेदों एवं नए झगड़ों के कारण बढ़ती गई।
तिलक ने वेदों के काल-निर्धारण से संबंधित अपने अनुसंधान के परिणामस्वरूप वेदों की प्राचीनता पर एक निबंध लिखा, जो गणित-ज्योतिषीय अवलोकन के प्रमाणों पर आधारित था। उन्होंने इस निबंध का सारांश इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ओरिएंटलिस्ट के पास भेजा जो सन् 1892 ई. में लंदन में हुई। अगले वर्ष उन्होंने इस पूरे निबंध को पुस्तकाकार “दि ओरिऑन या दि रिसर्च इनटु द एंटिक्विटी ऑफ द वेदाज” शीर्षक से प्रकाशित किया। उन्होंने इस पुस्तक में ओरिऑन की ग्रीक परंपरा और ‘लक्षत्रपुंज’ के संस्कृत अर्थ ‘अग्रायण या अग्रहायण’ के बीच संबंध को स्थापित किया है। अग्रहायण शब्द का अर्थ वर्ष का प्रारंभ है,तो उन्होने यह निष्कर्ष दिया कि ऋग्वेद के सभी स्रोत जिनमें इस शब्द का संदर्भ है या इसके साथ जो भी विभिन्न परंपराएँ जुड़ी थीं, की रचना ग्रीक लोगों के हिंदुओं से पृथक् होने से पूर्व की गई होगी।यह वह समय रहा होगा, जब वर्ष का प्रारंभ सूर्य के ओरिऑन या मृगशिरा नक्षत्र पुंज में रहते समय अर्थात् ईसा से 4000 वर्ष पहले हुआ होगा। इस पुस्तक की प्रशंसा यूरोप और अमेरिकी विद्वानों ने की। अब यह कहा जा सकता है कि तिलक के निष्कर्षों को लगभग सभी ने स्वीकार कर लिया है।


अनेक प्राच्यविदों, जैसेकि – मैक्समुलर, वेबर, जेकोबी, और विटने ने तिलक की विद्वता और मौलिकता को स्वीकार किया है। पुस्तक के प्रकाशन के बाद तिलक ने कुछ समय तक प्रोफेसर मैक्समुलर और वेबर के साथ पुस्तक में उठाए गए कुछ भाषा-विज्ञानीय प्रश्नों पर पत्र व्यवहार किया। इसके परिणामस्वरूप दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि इस विषय के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। अमेरिका के प्रो. विटने ने सन् 1894 ई. में अपनी मृत्यु से कुछ पहले ‘जर्नल ऑफ दि अमरीकन ओरिएंटल सोसाइटी’ में एक लेख लिख कर तिलक के सिद्धांतों की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
इसी तरह ‘जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी’ के ‘डॉ. ब्लूमफील्ड’ ने एक वार्षिकोत्सव में भाषण करते हुए तिलक की पुस्तक की प्रशंसा इन शब्दों में की थी- ‘‘पिछले दो-तीन महीने के दौरान अत्यधिक महत्त्व की एक साहित्यिक घटना हुई है- एक ऐसी घटना, जो निश्चय ही आनंददायक स्मृतियों से अधिक विज्ञान और संस्कृति की दुनिया में उथल-पुथल मचा देगी। लगभग दस सप्ताह पहले मुझे भारत से एक छोटे आकार की पुस्तक मिली। उसकी साज-सज्जा भद्दी थी और स्थानीय प्रेस में छपाई के कारण उसमें अनेक ग़लतियाँ थीं। यह पुस्तक मुझे लेखक ने, जिससे मेरा कोई परिचय नहीं था, शुभकामनाओं के साथ भेजी थी। मैंने लेखक का नाम कभी भी नहीं सुना था। बाल गंगाधर तिलक, बी.ए. एल.एल.बी, लॉ के लेक्चरर और वक़ील, पूना। इस पुस्तक का प्रकाशन श्रीमती राधाबाई आत्माराम सैगून, पुस्तक-विक्रेता और प्रकाशक, बंबई ने किया है। पुस्तक का शीर्षक है ‘ओरिऑन या रिसर्चेज इनटु द एंटिक्विटी ऑफ वेदाज़’। मेरे पास यह पुस्तक मुझे इसके पक्ष में करने के लिए नहीं भेजी गई थी। मैंने इसे एक ऐसी जगह पर रख दिया, जहाँ से मैं इसे रात्रि-भोज के बाद आसानी से उठा सकूँ और कुछ पृष्ठ पढ़ने के बाद अलग रख सकूँ। डाक के जरिए इस तरह की बहुत-सी-सामग्री मेरे पास पहुँचती रहती है।इसकी भूमिका बहुत उत्साहवर्धक नहीं थी।

लेखक नम्रता के साथ सूचित करता है कि ऋग्वेद का रचनाकाल ईसा के जन्म से चार हज़ार वर्ष पहले से कम नहीं हो सकता और हिन्दू परंपरा के साथ इसका काल ईसा के 6000 वर्ष पूर्व होना चाहिए। हिंदुओं को प्रचुर कल्पना-शक्ति, के बारे में कुछ भी स्वीकार करने की प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर मैंने सोचा कि मैं पुस्तक के कुछ पन्ने उलट कर उसे मुस्कुराहट के साथ अलग रख दूँगा। लेकिन कुछ ही समय बाद मेरी मुस्कुराहट गायब हो गई और मुझे लगा कि कोई असाधारण घटना हो गई है। सबसे पहले मैं लेखक की इस बात से प्रभावित हुआ कि उन्होंने वैदिक साहित्य और इस विषय से संबंधित पाश्चात्य साहित्य का गंभीर अध्ययन किया है। शीघ्र ही मेरा सतही अध्ययन गंभीर अध्ययन में बदल गया। उपहास की भावना के स्थान पर मैं लेखक की बातों का कायल होने लगा। निस्संदेह यह पुस्तक साहित्य के क्षेत्र में सनसनी पैदा करने वाली है। तिलक की खोज के परिणामों को समझने में काफ़ी समय लगेगा।”
अगर तिलक तत्काल उसी दिशा में आगे बढ़ते रहते और उन अनेक प्रश्नों का समाधान खोज़ते, जो उनकी पुस्तक में अनुत्तरित रह गए थे तो अच्छा होता, लेकिन लॉ लेक्चरर और पत्रकारिता व्यवसाय के कारण उनको भाषाशास्त्र और इतिहास से संबंधित प्रश्नों पर ध्यान देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था।

सन्दर्भ
https://www.pustak.org/index.php/books/bookdetails/3520
https://zedhindi.com/lokmanya-bal-gangadhar-tilak-biography/

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