Opinion

‘गीता रहस्य’ और ‘स्वराज’ का तिलक

बाल गंगाधर तिलक ने भगवद्गीता के इस रूढ़िवादी सार को नकार दिया कि यह पुस्तक सन्यास की शिक्षा देती है; उनके अनुसार, इससे मानवता के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का संदेश मिलता है। तिलक का मत था कि यदि स्वराज्य संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं होता है, तो हिंसात्मक साधनों को अपनाने में कोई बुराई नहीं है।
बाल गंगाधर तिलक का मत था कि यदि स्वराज्य संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं होता है, तो हिंसात्मक साधनों को अपनाने में कोई बुराई नहीं है।वह मानते थे कि साध्य की पवित्रता साधन को भी पवित्र बना देती है। इसलिए वे राजनीतिक भिक्षावृत्ति की नीति को बदलने को कहते थे।
तिलक का कहना था कि “विदेशी शासन चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह स्वशासन से श्रेष्ठ नहीं हो सकता।”भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए तिलक के विचार ज़रा ज़्यादा ही उग्र थे। नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे- मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया।
इस मामले पर सन् १९०७ ई. में कांग्रेस के ‘सूरत अधिवेशन’ में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सज़ा दे दी और मंडाले,(बर्मा, वर्तमान में म्यांमार ) निर्वासित कर दिया। ‘ मंडाले जेल’ में तिलक ने अपनी महान् कृति ‘भगवद्गीता – रहस्य’ का लेखन शुरू किया, जो हिन्दुओं की सबसे पवित्र पुस्तक का मूल टीका है। तिलक ने भगवद्गीता के इस रूढ़िवादी सार को नकार दिया कि यह पुस्तक सन्यास की शिक्षा देती है; उनके अनुसार, इससे मानवता के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का संदेश मिलता है।
प्रथम विश्वयुद्ध के ठीक पहले सन् १९१४ में रिहा होने पर वह पुन: राजनीति में कूद पड़े और ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ – बाल गंगाधर तिलक के नारे के साथ इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। सन् १९१६ ई. में वह फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए तथा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हुए ऐतिहासिक लखनऊ समझौते पर हस्ताक्षर किये जो उनके एवं पाकिस्तान के भावी संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना के बीच हुआ था। ‘इंडियन होमरूल लीग’ के अध्यक्ष के रूप में तिलक सन् १९१८ में इंग्लैंड गए। उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटेन की राजनीति में ‘लेबर पार्टी’ एक उदीयमान शक्ति है, इसलिए उन्होंने उसके नेताओं के साथ घनिष्ठ संबंध क़ायम किये। उनकी दूरदृष्टि सही साबित हुई। सन् १९४७ ई. में ‘लेबर सरकार’ ने ही भारत की स्वतंत्रता को मंज़ूरी दी। इस बात से वह बराबर इंकार करते रहे कि उन्होंने हिंसा के प्रयोग को उकसाया।
तिलक सन् १८९५ ई. में ‘शिवाजी स्मरणोत्सव आंदोलन’ के साथ जुड़ गए। उस वर्ष २३ अप्रैल के ‘केसरी’ में प्रकाशित एक लेख से जनता में इतना उत्साह जागृत हुआ कि रायगढ़ में शिवाजी की समाधि के पुनर्निर्माण के लिए थोड़े ही समय में २०००० रू. एकत्र हो गए। इसमें से अधिकांश पैसा छोटे-छोटे चंदों से प्राप्त हुआ था। उसी समय से शिवाजी के जन्मदिवस और राज्याभिषेक पर भी समारोह मनाए जाने लगे।
जब सन् १८९५ के क्रिसमस के दौरान पूना में राष्ट्रीय कांग्रेस का ग्यारहवां अधिवेशन करने का निश्चय किया गया तो पूना की सभी पार्टियों ने सर्वसम्मति से तिलक को ‘स्वागत समिति’ का सचिव बनाया। इस हैसियत से ‘कांग्रेस अधिवेशन’ के आयोजन के सारे काम तिलक को करने पड़े। उन्होंने सितंबर तक कार्य किया। जब इस विषय पर विवाद हो गया कि क्या कांग्रेस के पंडाल में सामाजिक परिषद भी होगी तो पार्टी में जबरदस्त झगड़ा हो गया जिसके कारण तिलक ने स्वयं को इस काम से अलग कर लिया, तथापि, उन्होंने कांग्रेस की गतिविधियों में दिलचस्पी लेना बन्द नहीं किया, बल्कि बाहर रहकर कांग्रेस अधिवेशन को सफल बनाने का पूरा प्रयास किया।

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