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कथित सेलेब्रिटीज राष्ट्रघाती गतिविधियों में क्यों ?

देश का सांस्कृतिक सम्मान बढ़ाने में विफल हुआ सिनेमा

राजेश झा

वर्ष १९५२ में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की स्थापना के अवसर पर कहा गया था कि ‘सिनेमा से अपेक्षा है कि यह समाज को देश के गौरवपूर्ण इतिहास एवं संस्कृति से परिचित कराकर राष्ट्रनिर्माण में आम लोगों को अपना योगदान करने की प्रेरणा देगा। लेकिन हुआ इस अपेक्षा के ठीक उलट। सिनेमा के किरदारों को राष्ट्रीय नायक – नायिका बनाने का खेल १९७८ में शुरू हुआ और उनके साथ ग्लैमर जोड़कर उनको अन्य क्षेत्रों के नायकों से अधिक प्रभावी बनाया गया। कालांतर में ये कथित सेलेब्रिटीज राष्ट्रघाती गतिविधियों में प्रत्यक्षतः और परोक्षतः सम्मिलित होते चले गए। न तो उनके सिनेमा ने समाज का भला किया न उनके आचरण ने देश के नवनिर्माण की प्रेरणा दी।इसके उलट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर देश के विरुद्ध नारेबाजी हो या आंदोलन अथवा मुसलमानों का मनबढ़ कारनामा -फ़िल्मी लोगों विशेषकर अभिनेता – अभिनेत्रियों ने देश का सर झुकाने का काम ही किया।
पूरे देश में रणवीर और उसकी नक़ल करते विष्णु विशाल नामक तमिल अभिनेता के विरुद्ध क्रोध है , लोग अलग -अलग स्थानों पर पुलिस के पास अपनी आपत्तियां देकर इनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं वहीं ‘द कश्मीर फाइल्स’ के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री और एक्ट्रेस स्वरा भास्कर ने अपना रिएक्शन दिया है। विवेक अग्निहोत्री ने इसे ‘रूढ़िवादी सोच’ कहा है वहीं स्वरा भास्कर , आलिया भट्ट, पूनम पांड, राम गोपाल वर्मा आदि रणवीर के समर्थन में उतर गए हैं। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है बल्कि अतीत में भी भारतीय संस्कृति को कलंकित करने में फ़िल्मी भांड आगे रहे हैं।
प्रोतिमा बेदी से लगायत रणवीर सिंह -विष्णु विशाल तक तथाकथित सेलिब्रिटीज की लम्बी कतार है जो स्वयं को सार्वजनिक रूप से नंगा करके भारत के सांस्कृतिक कानूनों को धता बताते हैं तो दीपिका पादुकोण से स्वरा भास्कर तक देशद्रोहियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘बिकी आत्माओं वाली पुतलियां’ कोई भी सीमा लांघने को तैयार मिलते हैं।ऐसे में देश के सामने यक्ष प्रश्न है – ये सेलिब्रिटीज इतने बेलगाम क्यों हैं ? देश से प्रश्न है कि इन बेलग़ामों को अनुशासन में कैसे रखा जा सकता है ?

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