Hinduism

वनवासी के हिन्दू होने के प्रमाणों से भरा है भारतीय सांस्कृतिक व सामाजिक साहित्य

राजेश झा

भारतीय सामाजिक -सांस्कृतिक वांग्मय में दो प्रकार के समाज हिन्दुओं में पाए गए हैं – एक वनों और वनाच्छादित क्षेत्रों में रहनेवाले वनवासी और दूसरे शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले ग्रामीण और शहरवासी । वनवासी और शहरवासी एक दूसरे के पूरक थे और उनमें अन्योन्याश्रय सम्बन्ध रहा है। भारत के वनवासियों का मूल धर्म शैव है और वे शिवलिंग की पूजा करते हैं। वनवासी समाज की कुलदेवी गौरी – चंडी -महालक्ष्मी हिन्दुओं की भी देवी हैं । रावत समुदाय की कुलदेवी मां चंडीदेवी हैं जिनकी पूजा शहरवासी हिन्दू भी करते हैं।

रावत समुदाय के लोग अखाती का त्योहार मेले के रूप में मनाते आए हैं।उस वनवासी समाज की कुलदेवी वाजेड माता का पहला मंदिर गुजरात और राजस्थान के क्षेत्र देवल में बनकर तैयार हो चुका है जिसकी स्थापना आखातीज पर होगी। वाजेड माता सेवा समिति देवलपाल के संयोजक शंकर कोटेड ने बताया कि आदिवासी समाज की कुलदेवी की उत्पत्ति हमीरगढ़ में हुई।उदयपुर में स्थित है ‘आमजा माता’भीलों की कुलदेवी है ।

इसके अलावा भैरव, कालिका, दस महाविद्याएं और लोक देवता, कुल देवता, ग्राम देवता की पूजा वनवासी करते हैं जिनकी पूजा ग्रामीण और शहरवासी हिन्दू भी करते हैं। वनवासी प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं तो ग्रामीण और शहरी लोग भी विभिन्न वृक्षों , पौधों ,नदियों तालाबों ,सूर्य चंद्र आदि की पूजा करते हैं।अंतर यह है कि वनवासी प्रत्यक्ष में उनकी पूजा करते हैं तो शहरवासी कुछ मामलों में उनकी प्रतिमूर्ति बनाकर पूजा करते हैं।वनवासियों में जैसे नागवंशी वनवासी और उनकी उप जनजातियां नाग की पूजा करते हैं वैसे ही शेष भारत के हिन्दू भी नागपंचमी का त्यौहार मनाते हैं।

क्रांति सूर्य, महामानव, जननायक, जल-जंगल-जमीन के रक्षक धरती आबा बिरसा मुंडा (Birsa Munda) को भारतीय वनवासी समुदाय अपना भगवान मानते है।गोविंद गुरु ने वनवासियों (Tribals) को संगठित करने का कार्य भी किया। श्रीराम ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने धार्मिक आधार पर संपूर्ण अखंड भारत के वंचितों और वनवासियों को एकजुट कर दिया था। वनवासियों में राम और हनुमान को सबसे अधिक पूजनीय इसीलिए माना जाता है कि सामान्य हिन्दू शहरी और ग्रामीण भी उनकी पूजा करते हैं।

रांची विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. करमा उरांव ने बताया कि वनवासी समाज में चार गोत्र हैं – मुंडा , गोत्र ,उराँव और खड़िया। कोल जाति के प्रमुख गोत्र हैं-आंग्रे, वनकपाल, चिहवे, थोरात, शांडिल्य, कश्यप और जालिया। कुछ खत्री उपजातियों एवं कुछ ब्राह्मणों की उपजातियों के गोत्र ऋषि ‘कौशल’ हैं। पंजाब के सारस्वत ब्राह्मणों के भी गोत्र ऋषि हैं एवं कई खत्रियों की उपजातियों के भी गोत्र ऋषि हैं। ये भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र हिरण्याभ कौशल ऋषि के वंशज हैं। उल्लेख मिलता है कि ऋषि कौशल के शिष्य याज्ञवल्क्य ऋषि थे।हिंदू धर्म में भी पहले चार गोत्र ही प्रमुख थे -अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भृगु। किन्तु बाद में इनकी संख्या दस हो गई। हिंदू पुराणों में अंगिरा, कश्यप,शांडिल्य,अत्रि ,वशिष्ठ और भृगु के साथ ही जमदग्नि, अत्रि, विश्वामित्र और अगस्त्य ऋषि नाम पर गोत्र जुड़ गए हैं।

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