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मुस्लिम डीएसपी अंकिता के हत्यारे शाहरुख को नाबालिग बता बचाने में लगा है

बिल्किस बानो पर आंसू बहाने वाले गैंग कहां है ?? झारखंड दुमका की 12वीं में पढ़ने वाली बेटी अंकिता कुमारी को ‘लव जेहादी’ शाहरुख ने पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। अंकिता का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने शाहरूख के जाल में फंसने से मना कर दिया था. क्या यह हिन्दू बेटी के न्याय के लिए भी आवाज़ उठाओगे? जैसे हम मर रहें हैं वैसे ही शाहरुख़ को भी तड़प कर मरना चाहिए: झारखंड की अंकिता के आख़िरी शब्द

जब मुस्लिम पुलिस अधिकारी नूर मुस्तफा भी ‘ इस्लामिक इस्टेट ‘ के लिए काम करता है और ‘अंकिता’ को पेट्रोल छिड़ककर जला मारनेवाले शाहरुख खान को पुलिस रिकॉर्ड में ‘नाबालिग’ लिख कर जाँच करता है तो स्वाभाविक है कि प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा में उर्दू को हटाकर आगे परीक्षाएँ कराने की मांग हो और बदमाश डीएसपी नूर मुस्तफा की बर्दी उतरवा ली जाय – लेकिन ऐसा होता नहीं दिखता। राज्य की हेमंत सोरेन सरकार पिकनिक पर है तो क्रांतिकारी सांसद निशिकांत दुबे मुस्लिम वोटरों की चरणपुजायी में लगे हैं।

झारखंड के दुमका में अंकिता को जलाये जाने के मामले में वहाँ के डीएसपी नूर मुस्तफा ने शुरू से ही अभियुक्त शाहरुख़ हुसैन को बचाने का प्रयास किया। एफ़आइआर में बालिग की जगह नाबालिग़ लिखवा दिये जाने की बात खबरों में आ रही है।डीएसपी के खिलाफ दुमका समेत पूरे राज्य के लोगों में भारी आक्रोश है और उनके वहाँ रहते लोगों को न्याय की उम्मीद नहीं।

एक सामान्य सपने ले कर जीने वाली लड़की। झारखंड के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी, जिसने अभी जीना शुरू भी नहीं किया था कि जला कर मार दी गयी। क्यों? क्योंकि किसी शाहरुख का दिल आ गया था उसपर! उसे बीवी बना कर अपनी झोपड़ी में ले जाना चाहता था। एक पढ़ी लिखी लड़की किसी जाहिल से विवाह का प्रस्ताव क्यों स्वीकार करती? सो मना कर दिया।
शाहरुख को चुभ गयी बात। वही बर्बर मुगलिया सोच! जो पसन्द आ गयी वह मेरी है। खिलजी से लेकर अकबर तक सबने यही तो सिखाया है। किसी अंकिता की इतनी औकात कि वह किसी शाहरुख की बात काट दे? शाहरुख घर में घुसे, पेट्रोल गिराया और जला दिया…
लड़की खुद दौड़ कर आंगन में आई, बाल्टी से पानी लेकर अपने ऊपर उड़ेला… अठारह वर्ष की बच्ची की जीने की लालसा! इस छोटी आयु में मरना कौन चाहता है? अस्पताल में वह हर मिलने वाले से एक ही बात पूछती थी- “मैं बच तो जाऊंगी न?”
पर नहीं बची। नब्बे फीसदी जल गई थी, कैसे बचती? जीवित जला दी गयी लड़की की पीड़ा कोई नहीं समझ सकता। कितना तड़पी होगी… और उसके तड़पने से कितना खुश हुआ होगा शाहरुख न! इसी लिए तो जलाया था। कहता था- मेरी न हुई तो तड़पा कर मारूंगा!
कोई नेता, पत्रकार उससे मिलने अस्पताल नहीं गया। क्यों जाता? राजनीति लायक मुद्दा नहीं था न! मर गयी तो मर गयी… यह राजनीति और पत्रकारिता की संवेदना का स्तर है।
आप सोच कर देखिये, शाहरुख भी तो जानता होगा कि इसके बाद पकड़ा जाएगा और जिंदगी जेल में सड़ते हुए कट जाएगी। पर नहीं! वह जानता है कि उसके जैसे दस शाहरुखों ने यदि दस अंकिताओं को जला दिया, तो ग्यारहवीं अंकिता किसी शाहरुख को मना नहीं कर पायेगी। वह अपने मिशन में सफल है। यही उसकी विजय है। पूरा खेल खौफ फैलाने का है…
वह यह भी जानता है कि उसके मुद्दे पर न कोई नेता विरोध करेगा, न किसी टीवी चैनल पर डिबेट होगा। उसको बचाने के लिए फंडिंग होगी और सम्भव है कि कुछ वर्षों में वह जेल से बाहर आ कर सुखी जीवन जीने लगे। इस देश में ऐसा होता रहा है।

शाहरुख अंकिता के पीछे बहुत दिनों से पड़ा था। वह कई बार उसके घर जा कर धमका चुका था। हर बार अंकिता के पिता उसे समझाने का प्रयास करते और छोड़ देते। यकीन कीजिये, उसके पिता की इसी अति-सहिष्णुता ने अंकिता की जान ली। यदि वह पिता उसी समय पुलिस के पास जाता, राजनैतिक संगठनों के पास जाता, तो सम्भव था कि आज लड़की जी रही होती। पर किसी भी तरह चुपचाप मामले को सुलटा लेने के भाव ने अंकिता को मार दिया। यह कठोर सच है कि हमारे देश में बेटियों से जुड़े मामले में इस तरह की निर्लज्ज चुप्पी आम है।
आप देखियेगा, केस चलेगा तब शाहरुख की माँ मीडिया में आ कर कहेगी- “हम बहुत गरीब हैं। मेरा बेटा ही कमाने वाला है। उसे छोड़ दिया जाय!” देश की बौद्धिकता उछलने लगेगी, आधी रात को कोर्ट खुलने लगेंगे। सब उसकी ओर खड़े हो जाएंगे। अंकिता की पीड़ा किसी को याद नहीं रहेगी।
जिस देश में कभी एक महारानी की प्रतिष्ठा पर पूरा राज्य बलिदान दे जाता था, वह देश अब बेटियों की सुरक्षा करना तक भूल गया है। इस देश का इससे अधिक दुर्भाग्य कुछ भी नहीं।

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