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हैदराबाद मुक्ति आंदोलन की विभीषिका

जब १५  अगस्त १९४७  को पूरा भारत स्वतंत्रता दिवस मना रहा था तो निजाम के राजसी शासन के लोग स्वामी रामानंद तीर्थ के नेतृत्व में  हैदराबाद राज्य को भारत में मिलाने की मांग करनेवालों पर अमानवीय  अत्याचार और दमन कर रहे थे। हैदराबाद की जनता को अपनी आजादी के लिए १३  महीने और २ दिन लंबा संघर्ष करना पड़ा था।  हैदराबाद की जनता ने निजाम और उसकी निजी सेना ‘रजाकारों’ की क्रूरता का बहादुरी से सामना कर अपनी स्वाधीनता  के लिए लंबे समय से जो  लड़ाई चला रखी थी ,उन्हें १७  सितम्बर १९४८ को उसका प्रतिसाद  मिला।  भारतीय सेना ने गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के निर्देश पर ‘ऑपरेशन पोलो’ के तहत पुलिस कार्रवाई करके  हैदराबाद इस्टेट को निजामशाही से मुक्त कराकर उसे, भारत का हिस्सा  बना लिया जिसमें वर्तमान के  तेलंगाना, मराठवाडा, उत्तर कर्नाटक, विदर्भ के कुछ भाग सम्मिलित थे।विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए पटेल को भारत का बिस्मार्क और लौह पुरूष भी कहा जाता है।

वर्ष १७२४ से सन् १९४८ तक निजाम हैदराबाद राज्य के शासक थे। हैदराबाद की जनता की सामूहिक इच्छा-शक्ति ने न केवल इस क्षेत्र को एक स्वतंत्र देश बनाने हेतु निजाम के प्रयासों को निष्फल कर दिया बल्कि इस प्रांत को भारत संघ में मिलाने का भी निश्चय किया।हैदराबाद प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेता  स्वामी रामानन्द तीर्थ (१९०३ –१९७२ ) महान  शिक्षाविद तथा सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्होने हैदराबाद मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया।  हैदराबाद राज्य, ब्रिटिश भारत की रियासत थी।.यदि निजाम को उसके षड़यंत्र में सफल होने दिया जाता तो भारत का नक्शा वह नहीं होता जो आज है। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर-पूर्व में चीन, नेपाल और भूटान, पूर्व में बांग्लादेश और म्यान्मार स्थित हैं। हिन्द महासागर में इसके दक्षिण पश्चिम में मालदीव, दक्षिण में श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व में इंडोनेशिया से भारत की सामुद्रिक सीमा लगती है। इसके उत्तर की भौतिक सीमा हिमालय पर्वत से और दक्षिण में हिन्द महासागर से लगी हुई है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी है तथा पश्चिम में अरब सागर हैं। अगर हैदराबाद इस्टेट को स्वतंत्र देश अथवा पकिस्तान का हिस्सा बनाने दिया जाता तो भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर संकट की तलवार लटकती रहती और देश में अशांति का वातावरण बना रहता।   .

सन् १९३८ -३९ में जब अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था तब ब्रिटिश शासकों ने हैदराबाद के निजाम से सांठ-गांठ कर हैदराबाद स्टेट में हिंदुओं की पूजा-अर्चना पर रोक लगा दी थी। हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खां और उसके वजीरे-आजम अकबर हैदरी ने एक-के-बाद-एक ऐसे फरमान जारी कर डाले कि ऋषि दयानन्द के सैनिक आर्य समाजी वीरों का खून ही खौल उठा। पहला फरमान यह था कि पहले आज्ञा लो और उसके बाद ही धर्म-प्रचार या जलसा-जुलूस हो। यहां तक कि आर्यसमाज-मन्दिरों में साप्ताहिक सत्संग भी रियासती सरकार की अनुमति के बाद ही हो सकेगा। स्पष्ट है कि मुस्लिम शासक इस फरमान के द्वारा आर्यों को आर्यभूमि पर ही गुलाम बनाने पर उतारू हो चला था। दूसरे फरमान का मतलब यह था कि घर हो या मन्दिर, ‘ओ३म्’ का नाम कहीं सुनाई या दिखाई न पड़े। ‘ओ३म्’ के ध्वज की जगह निजाम का ध्वज फहराने का आदेश दिया गया। इस फरमान में आर्य-संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेंकने की चाल चली गई थी। तीसरे फरमान में यज्ञ-हवन पर भी पाबन्दी लगा दी गई। इस तरह आर्यजनों के मिल बैठने और प्रभु-उपासना के सारे रास्ते बन्द कर दिये गए।

वर्ष १९३९ में हैदराबाद में निजाम द्वारा किए गए अत्याचारों से यहां की बहुसंख्यक हिन्दू (आर्य) प्रजा आर्तनाद कर रही थी। निजाम ने अपने अधिकार क्षेत्र में   हिन्दुओं के सभी धार्मिक क्रिया- कलापों तथा अधिकारों पर रोग लगा दी थी। हिन्दू अपने घरों मे यज्ञ कुण्ड नहीं बना सकते थे तथा हनुमान आदि अन्य मन्दिरों में भगवा झंडा नहीं फहरा सकते थे। कतिपय धार्मिक संस्कारों के लिए निजाम की आज्ञा पहले से ही प्राप्त करनी पड़ती थी जो कि बहुत कष्टप्रद थी। कितने आश्चर्य की बात है कि निजामी राज्य में हिन्दू न तो यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहन सकते थे और न यज्ञ हवन कर सकते थे। मन्दिर में घंटे-घडि़याल बजाना, कीर्तन, जागरण करना, रामायण, गीता, महाभारत की कथा कहना सभी को निजाम ने गैर कानूनी घोषित कर दिया था। हिन्दुओं तथा उनके बच्चों तथा स्त्रियों पर मुस्लिम गुण्डे मनमाने अत्याचार करते थे। हिन्दू स्त्रियों का अपहरण साधारण सी बात थी। अति संक्षेप में कहें तो निजाम राज्य ने बिल्कुल औरंगजेबी राज्य का रूप धारण कर लिया था।

वीर सावरकर ने २२  जनवरी सन् १९३९ को समस्त देश में ” निजाम निषेध दिवस”  मनाने का आवाहन किया।वीर सावरकर जी ने देश के अनेक स्थानों पर जाकर इस सत्याग्रह के प्रचार में जोशीले भाषण दिए और सत्याग्रहियों को हैदराबाद भेजा। वीर सावरकर की प्रेरणा पर सनातन धर्मी विचारधारा के भी अनेक व्यक्ति हैदराबाद आन्दोलन में जेल गए और भीषण यातनाएं सहन कीं। वीर सावरकर ने पूणे जाकर हिन्दू महासभा का विशाल जत्था हैदराबाद भिजवाया।  इसका सुपरिणाम यह हुआ कि आर्यसमाज के इस शानदार सत्याग्रह की ओर पूरे देश का ध्यान गया । इधर नागपुर में वीर सावरकर की अध्यक्षता मे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का अधिवेशन हुआ तो उन्होंने हैदराबाद आर्य सत्याग्रह के सम्बन्ध में भाषण देते हुए कहा- ” हैदराबाद निजाम के अमानवीय अत्याचारों के विरुद्ध समस्त देश की हिन्दू जनता को एक सूत्र में संगठित होकर इस धर्मयुद्ध  में कूद पड़ना चाहिए। यदि निजाम की धर्मान्धता का विषैला फन न कुचला गया तो भोपाल व अन्य मुस्लिम स्थानों पर भी हिन्दुओं पर अत्याचार किए जाएंगे। “

इसके बाद खुलना में हिन्दू परिषद् की बैठक हुई तो वीर सावरकर का भी भाषण हुआ। उनके औजस्वी भाषण को सुनकर खुलना में ही पहली बार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुत प्रभावित हुए और वे हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गए। खुलना से भी सावरकर जी की प्रेरणा पर हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में एक विशाल जत्था गया। हैदराबाद के इस सत्याग्रह में हिन्दू वीर शहीद हुए। उनका बलिदान रंग लाया और निजाम सरकार को आर्यसमाज के साथ समझौता करना पड़ा। पं. नरेन्द्र जी (हैदराबाद) के अनुसार हैदराबाद सत्याग्रह में आर्यजनता का तत्कालीन दस  लाख रुपया व्यय हुआ। इस पूरी राशि को  घनश्याम सिंह गुप्त हैदराबाद शासन से वसूल करना चाहते थे। वे सब अकबर हैदरी, मुख्यमन्त्री से मिले और  हैदराबाद शासन को झुकना पड़ा तथा  उसने लगभग १५ लाख रुपया आर्यसमाज को दिया। इस राशि से न केवल आर्य सत्याग्रहियों के आने-जाने का खर्च ही पूरा हुआ अपितु उनके व्यवसाय में जो हानि हुई थी, उसका भी हर्जाना मिला। इसे कहते हैं -“सत्यमेव जयते।”

इसी प्रकार सन् १९४४  में सिंध सरकार ने जब ऋषि दयानन्द लिखित सत्यार्थ प्रकाश के १४  वें समुल्लास पर प्रतिबन्ध लगाया था, उस समय भी सन् १९४४  में बिलासपुर में हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में भाई परमानन्द  तथा वीर सावरकर ने तीव्र आलोचना करते हुए कहा था -” जब तक सिंध में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर पाबन्दी लगी है तक तक कांग्रेस शासित प्रदशों में कुरान पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग प्रबल की जानी चाहिए। ” वीर सावरकर तथा डॉ. मुंजे,पूर्व मध्य प्रदेश तथा बरार विधान सभा के अध्यक्ष श्री धनश्याम सिंह आदि ने आर्य समाज के  आंदोलन को समर्थन दिया जिसे ‘हैदराबाद सत्याग्रह’ कहा जाता है। इस आन्दोलन में हिन्दू महासभा ने आर्य समाज का साथ दिया। इन मुस्लिम शासकों को ज्ञान ही नहीं था कि आर्यों में सहनशीलता जब समाप्त होती है तो उसके क्रोध की आंधी सबकुछ तहस -नहस कर देती है।  कुछ दिनों में ही निजाम और उसके वजीरे–आजम को मालूम हो गया कि वे बर्रे के छत्ते में हाथ डाल बैठे थे।

निजाम अपने राज्य को  ‘दारुल-इस्लाम’ ( इस्लामी मजहबी)  राज्य बनाना चाहते थे जिसमें ‘जिहादी और गाजी’ बनाना  पुण्य का कार्य माना जाता है। ऐसी विकट स्थिति का सामना करने तथा वहां के नागरिकों को मौलिक अधिकार दिलाने के लिए  शोलापुर में आर्यसमाज ने निजाम के अत्याचारों का प्रतिकार करने के लिए एक आर्य महासम्मेलन का आयोजन किया। इस आर्य सम्मेलन के अध्यक्ष थे  बापूजी अणे और संयोजक स्वामी महात्मा नारायण स्वामी जी सरस्वती। इसके पूर्व छत्रपति शिवाजी की आत्मा के रूप में वीर सावरकर का धर्मनिष्ठ हिन्दू हृदय निजाम के अत्याचारों से चीत्कार उठा था। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए वीर सावरकर तुरन्त शोलापुर पहुचे और उन्होंने सम्मेलन में सिंह गर्जना करते हुए घोषणा की ”आर्यसमाज हैदराबाद आन्दोलन में अपने आपको अकेला न समझे। हिन्दू महासभा अपनी सम्पूर्ण शक्ति आर्यसमाज के साथ लगाकर निजाम की हिन्दू विरोध निति व इस्लाम’ बनाने की ओर सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा था तथा शेष भारत उसे ‘दारुल-हरब’ लग रहा था। और यह इस्लाम का दर्शन भी कि ‘दारुल-हरब कार्यकलापों को चकनाचूर करके ही दम लेगी।“

वर्ष १९३८ के दिसम्बर की अन्तिम तारीखों में आर्यसमाज ने हैदराबाद में सत्याग्रह की घोषणा कर दी। पांच–सात दिनों बाद रियासत के मुख्यमन्त्री को अपनी मांगे पेश करते हुए आर्यसमाज ने स्पष्ट लिख दिया कि निजामशाही धार्मिक कामों में हस्तक्षेप न करे और आर्य–धर्मोपासना पर लगाई गई सभी पाबन्दियां हटा ले। एक सप्ताह की चेतावनी देकर, महात्मा नारायण स्वामी जी के नेतृत्व में गुरुकुल के विद्यार्थियों ने रियासत में प्रवेश किया ओर ‘ओ३म्’ का नाद गुंजाते हुए गिरफ्तारियां दीं। उन्हें हिरासत में लेकर रियासत से बाहर शोलापुर में छोड़ दिया गया। सत्याग्रहियों ने दूसरी टोली को नेतृत्व सौंपकर, दोबारा गिरफ्तारियां दे दीं। इस बार उन्हें एक वर्ष के लिए कठोर कारावास का दण्ड दिया गया। दूसरी टोली श्री चांदकिरण शारदा के नेतृत्व में गई तो सत्साग्रहियों को तेरह महीने सक्षम कारावास के लिए भेज दिया गया। तीसरी टोली के नेता बने खुशहालचन्द जी ‘खुर्सन्द’। एक दूरदर्शी पत्रकार होने के नाते उन्होंने पहले धुआंधार प्रचार किया। नगर–नगर और गांव–गांव जाकर सारी स्थिति स्पष्ट की। बम्बई जाकर समाचार- पत्रों के सम्पादकों से मिले। प्रेस ने इसे धार्मिक हस्तक्षेप मानते हुए हैदराबादी निजाम के विरुद्ध लेख और समाचार प्रकाशित किये। अब यह मामला आर्यसमाज तक सीमित न रहकर समूचे देश की आवाज बन गया। निजाम-सरकार ने बुद्धिजीवियों को खरीदकर ऐसे लेख और कविताएं छपवाई जिनसे यह प्रतीत हो कि मामला ‘हिन्दू-मुस्लिम-विवाद’ का है।

खुशहालचन्द ने प्रेस के माध्यम से स्पष्ट प्रचारित करा दिया कि आर्यों को मुस्लिम  के तौर-तरीकों से कोई विरोध नहीं है और निजाम-सरकार अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए झूठे  बहाने तलाश रही है। इधर से दाल न गली तो निजाम–सरकार ने एक और झूठ प्रचारित कर दिया कि सनातनधर्मी जनता पूरी तरह निजाम के पक्ष का समर्थन करती है। खुशहालचन्द  सीधे ‘बद्रीनाथ मठ’ के जगद्गुरु शंकराचार्य जी के पास पहुंच गए। जगद्गुरु ने भी स्पष्ट घोषणा कर दी–‘‘इस धर्मयुद्ध में सनातनधर्मी जगत् ‘आर्यसमाज’ के साथ है।” फिर क्या था, सिक्खों ने भी आर्यबन्धुओं के साथ सत्याग्रह के मैदान में उतरने का शंख बजा दिया। ये समाचार विदेशों तक लपक लिए गए। मलय, बर्मा, अफ्रीका ओर थाईलैंड आदि देशों से भी सत्याग्रहियों के जत्थे आने की तैयारी करने लगे। निजाम और उसके वजीरे-आजम के हाथ-पांव फूल गए। उन्हें सपने में भी यह आशा नहीं थी कि मुट्ठीभर आर्यसमाजियों के लिए बाहर के देश भी हल्ला बोल देंगे।

आन्दोलन की कमर तोड़ने के लिए निजाम ने एक नई चाल चली। उन दिनों भारत में एक ही समाचार–एजेंसी थी ‘एसोसिएटेड प्रेस’। इस एजेंसी का मुंह रुपयों से बन्द करके यह मिथ्या समाचार प्रचारित करा दिया कि ‘सरकार और सत्याग्रहियों में समझौता हो गया है और आर्य–सत्याग्रह बन्द हो चुका है।’खुशहालचन्द जी ने तुरन्त समाचार पत्रों द्वारा खण्डन करा दिया कि ‘सत्याग्रह जारी है और इसे बन्द कराने का अधिकार केवल आर्यसमाज की सार्वदेशिक सभा को है।’ निजाम–सरकार डाल–डाल थी तो खुशहालचन्द जी पात–पात थे। निजाम के पास दण्ड–व्यवस्था थी और सत्याग्रही निहत्थे थे, फिर भी, खुशहालचन्द जी के भाषणों और प्रेस–वक्तव्यों ने निजामशाही को जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया। रियासती सरकार द्वारा हो रहे दमन पर सब जगह थू-थू हो रही थी। पूरे देश में हड़कम्प-सा मच गया। यह सत्याग्रह केवल आर्यसमाज तक सीमित न रहकर मनुष्यमात्र का धर्म-युद्ध बन गया। जो कांग्रेसी आर्य-विचारधारा के थे, वे कुछ समय के लिए गांधी जी को छोड़कर प्रभु-नाम पर लगे बन्धनों को तोड़ फेंकने के लिए हैदराबाद की ओर कूच करने लगे। निजामशाही अब भी अपनी हठधर्मी पर अडिग थी। खुशहालचन्द जी को उनके साथियों–समेत तेरह–तेरह महीने के लिए कड़ी कैद का दण्ड देकर जेल में ठूंस दिया। उन्हें पत्थर तोड़ने का काम दिया गया तो खुशहालचन्द जी ने ठहाका लगाकर यह डयूटी सिर–आंखों पर स्वीकार कर ली और बोले-‘‘अरे भाई, जुल्मों–सितम के पत्थर तोड़ते–तोड़ते ही तो हम जवान हुए हैं। इसका तो हमें बचपन से अभ्यास है।”

निजामशाही ने जेल में और जेल से बाहर सत्याग्रहियों पर मनमाने अत्याचार किये, परन्तु सत्याग्रहियों के कारवां निरन्तर ‘ओ३म्’ का नाद गुंजाते रहे। सन् १९३९ के जुलाई मास तक सत्याग्रहियों के जत्थे गिरफ्तारियां देते रहे। जेलें भर गईं, मगर सत्याग्रहियों का तांता न टूटा। निजामशाही की अब दुनियाभर में निन्दा होने लगी। आर्यसमाज के हाथों नाकों चने चबाकर निजाम की नीदें हराम हो गई। अगस्त, १९३९  में उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी। ‘ओ३म्’ का ध्वज लगाने, यज्ञ–हवन करने और सत्संग पर लगाई गई सारी पाबन्दियां हटा ली गईं। इस प्रकार आर्यसमाज के साथ समझौता करके निजाम–सरकार ने अपना पिण्ड छुड़ाया।सत्याग्रह में महात्मा नारायण स्वामी  के साथ जेल की सजा खुशहालचन्द जी के लिए महान् वरदान बन गई। नारायण स्वामी जी अपने युग के प्रकाण्ड विद्वान्, वेदों के मर्मज्ञ, उच्च कोटि के संन्यासी थे और अध्यात्म-विद्या में गहरी पैठ रखते थे। खुशहालचन्द  को उनके संसर्ग में परम-शान्ति का आभास होता था। आत्म-दर्शन की जो उत्कट अभिलाषा उनके मन में किशोरावस्था में थी, नारायण स्वामी जी के निकट रहकर वह और अधिक भड़क उठी। खुशहालचन्द जी ने उनसे संन्यास की दीक्षा देने का भी अनुरोध किया, परन्तु नारायण स्वामी जी ने कहा ‘‘अभी प्रतीक्षा कीजिए। सन्यास का अभ्यास अभी घर में ही कीजिए और इसी को संन्यास की तैयारी समझिये।”

उन्होने डायरी में जेल यातनाओं पर कविताएं भी लिखी हैं जिसके अनुसार इमली की चटनी से ज्वार की रोटियों में शीशा पीस कर दिया जाता था।लगभग  एक साल तक आंदोलन पूरे भारत में चला, जिसमें दस  हजार से अधिक की गिरफ्तारियां हुई। बाद में इस आंदोलन से घबराकर निजाम सरकार को झुकना पड़ा था और हिंदुओं के सभा धार्मिक अधिकार बहाल किए गए। गुरुकुल डौरली का इस आंदोलन में बड़ा योगदान था। स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय रत्नाकर शास्त्री के बेटे समाजसेवी शीलेंद्र चौहान का कहना है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में गुरुकुल डौरली का बड़ा योगदान है।
               
ऑपरेशन पोलो सितम्बर १९४८ में संपन्न  भारतीय सेना के गुप्त ऑपरेशन का नाम था जिसमें हैदराबाद के आखिरी निजाम को सत्ता से अपदस्त कर दिया गया और हैदराबाद को भारत का हिस्सा बना लिया गया। ध्यातव्य है कि भारत की स्वतंत्रता के बाद जब भारतीय संघ का गठन हो रहा था, हैदराबाद के निजाम ने भारत के बीच में होते हुए भी स्वतंत्र देश रहने की ही कवायत शुरू की थी। विभाजन के दौरान हैदराबाद भी उन शाही घरानो में से था जिन्हे पूर्ण आजादी दी गई थी हालाँकि १९४८  में उनके पास दो ही विकल्प बचे थे भारत या पाकिस्तान में शामिल होना। ज्यादातर हिन्दू आबादी वाले राज्य के मुस्लिम शासक और आखिरी निजाम ओस्मान अली खान ने आजाद रहने फैसला किया और अपने साधारण सेना के बल पर राज करने का फैसला किया। निजाम ने ज्यादातर मुस्लिम सैनिको वाली रजाकारों की  सेना बनाई। रजाकार सेना की दुर्दांतता के कारण सरदार पटेल ने हैदराबाद को जबरदस्ती कब्जाने का फैसला किया था। सरदार पटेल ने ये काम पुलिस के द्वारा किया जिसमे सिर्फ पांच दिन लगे रजाकारों की मुस्लिम सेना आसानी से हार गई।

अभियान के दौरान व्यापक तौर पर जातिगत हिंसा हुई थी, अभियान समाप्ति के बाद नेहरू ने इसपे जाँच के लिए सुन्दरलाल कमिटी बनाई थी जिसकी रिपोर्ट साल २०१४ में  सार्वजनिक हुई। सुन्दरलाल कमिटी की रिपोर्ट के मुताबिक इस अभियान में २७  से ४० हजार लोग मारे गए थे  हालाँकि जानकार ये आंकड़ा दो लाख से भी ज्यादा बताते हैं। मुस्लिम लीग के निर्माता जिन्ना के प्रभाव में हैदराबाद के निजाम नवाब बहादुर जंग ने लोकतंत्र को नहीं माना था, नवाब ने काज़मी रज्मी को जो की एमआईएम (मजलिसे एत्तहुड मुस्लिमीन) का प्रमुख लीडर था और जिसने दो लाख रजाकारों की सेना बनाई थी। मुस्लिम आबादी बढ़ने के लिए उसने हैदराबाद में लूटपाट मचा दी थी, जबरन इस्लाम हिन्दू औरतो के रेप ,सामूहिक हत्याकांड करने शुरू कर दिए थे क्योंकि हिन्दू हैदराबाद को भारत में चाहते थे।  मीरपुर नौखालिया नरसंहार (मुसलमानों ने किया हिन्दुओ पे) में  पांच हजार से ज्यादा हिन्दुओ को रजाकार मार चुके थे जो की आधिकारिक आंकड़े है, हैदराबाद के निजाम को पाकिस्तान से म्यांमार के रास्ते लगातार हथियार और पैसे की मदद मिल रही थी। ऑस्ट्रेलिया की कंपनी भी उन्हें हथियार सप्लाई कर रही थी, तब पटेल ने तय किया कि  इस तरह तो हैदराबाद भारत के दिल में नासूर बन जायेगा और तब आर्मी ऑपरेशन पोलो को प्लान किया गया। कहा जाता है कि ऑपरेशन के बाद में हर जगह सेना ने रजाकारों की पहचान कर कर के उनको मौत के घाट उतारा  था।
                                     
रजाकार एक निजी सेना (मिलिशिया) थी जो निजाम ओसमान अली खान आसफ जाह VII के शासन को बनाए रखने तथा हैदराबाद स्टेट को नवस्वतंत्र भारत में विलय का विरोध करने के लिए बनाई थी। यह सेना कासिम रिजवी द्वारा निर्मित की गई थी। रजाकारों ने यह भी कोशिश की कि निजाम अपनी रियासत को भारत के बजाय पाकिस्तान में मिला दे। रजाकारों का सम्बन्ध ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन’ नामक राजनीतिक दल से था। रजाकार के मुकाबले में स्वामी रामानंद तीर्थ के नेतृत्व में तेलंगाना के लोगोंं के साथ मिलकर ‘आंध्र हिंदू महासभा’ का गठन किया और भारत के साथ राज्य के एकीकरण की मांग की। रजाकार तेलंगाना और मराठवाड़ा क्षेत्र में कई लोगों की नृशंस हत्या, बलात्कार आदि के लिए जिम्मेदार थे। आखिरकार, भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो के दौरान रजाकर का खात्मा करके कासिम रज़वी को पकड़ लिया। शुरू में उसे जेल में बंद किया और फिर शरण प्रदान करके पाकिस्तान जाने की अनुमति दी थी। .

सन्दर्भ
https://www.pravakta.com/aryasamaj-satyagraha-for-freedom-of-religion-in-hyderabad-1939/

http://www.thearyasamaj.org/detailtopstories?topstoryid=366&topstorypage=eventnewsvsk

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