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समाजसुधारक समरसतावादी महाराजा हरि सिंह

भारत की स्वाधीनता की रचना में जम्मू -कश्मीर(jammu and kashmir) के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह (maharaja hari singh)के समक्ष भारत अथवा पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र देश बनने का विकल्प था। उनके परदादा गुलाब सिंह ने अंग्रेजों से ७५ लाख रूपये में जो जम्मू -कश्मीर राज खरीदा था उसकी सीमाएं चार देशों भारत -पाकिस्तान -तिब्बत और अफगानिस्तान से मिलती थी इसलिए उन्होने स्वतंत्र देश के रूप में अपनी पहचान बनाने और स्विट्ज़रलैंड जैसा देश इसको बनाने का सपना देखा।

किन्तु पाकिस्तांन ने कबलाई युद्ध का षड्यंत्र कर जम्मू -कश्मीर पर कब्जा करना चाहा तो महाराजा हरि सिंह ने भारत में अपनी रियासत का विलय कर दिया और उसके लिए वायसराय लार्ड माउंटबेटन द्वारा लगाई शर्त कि वे जम्मू कश्मीर नहीं जाएंगे ताकि वहां शांति बनी रहे – स्वीकार ली। महाराजा हरि सिंह का जन्म 23 सितंबर 1895 को जम्मू में हुआ था, तथा उनका निधन 26 अप्रैल 1961 को 65 उम्र साल की उम्र में महाराष्ट्र में हुआ था। महाराजा हरि सिंह के पिता का नाम अमर सिंह और माता का नाम भोटियाली छिब था। अपने चाचा की मृत्यु के बाद, 23 सितंबर 1923 को हरि सिंह जम्मू और कश्मीर के नए महाराजा बने।जम्मू -कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाकर वे मुंबई में रहने लगे जहां 26 अप्रैल 1961 को उनकी मृत्यु हो गयी।

आज जम्मू -कश्मीर रियासत के महान राजा हरि सिंह की जयन्ती है जिनको षड्यंत्रपूर्वक न केवल अपने जन्म व कर्मभूमि से बाहर रखा गया बल्कि उनके कामकाजों को भी बौने कद के नेताओं ने जन साधारण के लिए विस्मृति का विषय बना दिया अन्यथा वे देश की प्रगति में अनुपम योगदान कर सकते थे। वर्ष
1925 में जब हरि सिंह गद्दी पर बैठे तो शुरुआत शानदार थी। ताजपोशी के बाद जिस तरह की घोषणाएँ उन्होंने कीं, उन्हें सचमुच क्रांतिकारी कहा जा सकता है। ‘द ट्रेजेडी ऑफ़ कश्मीर’ में इतिहासकार एचएल सक्सेना के अनुसार अपने पहले संबोधन में महाराजा हरि सिंह ने कहा, “मैं एक हिन्दू हूँ लेकिन अपनी जनता के शासक के रूप में मेरा एक ही धर्म है-न्याय. वह ईद के आयोजनों में भी शामिल हुए और 1928 में जब श्रीनगर शहर बाढ़ में डूब गया तो वह स्वयं दौरे पर निकले। अपने राजतिलक समारोह में उन्होंने जो घोषणाएँ कीं थीं वे सचमुच आधुनिकीकरण की ओर बढ़ाए गए क़दम थे.जैसे उनमें जम्मू और कश्मीर घाटी में 50-50 तथा गिलगित और लद्दाख में 10-10 स्कूल खोलने की घोषणा की और उनके निर्माण के लिए लकड़ी वन विभाग से निःशुल्क देने की व्यवस्था की। जम्मू और घाटी में तीन-तीन चल डिस्पेंसरियाँ खोलना, तकनीकी शिक्षा का विस्तार करना, श्रीनगर में एक अस्पताल खोलना, पीने के पानी की व्यवस्था करना उनके कई बड़े क़दमों में शामिल थे।

विवाह की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर उन्होंने लड़कों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 14 वर्ष कर दिया। इसके साथ ही, उन्होंने बच्चों के टीकाकरण का इंतज़ाम भी कराया। महाराजा हरि सिंह ने किसानों की हालत सुधारने के लिए ‘कृषि राहत अधिनियम’ बनाया जिसने किसानों को महाजनों के चंगुल से छुड़ाने में मदद की। शैक्षणिक रूप से अत्यंत पिछड़े जम्मू -कश्मीर में उन्होंने अनिवार्य शिक्षा के लिए नियम बनाए, सभी के लिए बच्चों को स्कूल भेजना ज़रूरी बना दिया। इसीलिए इन स्कूलों को लोग ‘जबरी स्कूल’ भी कहने लगे.लेकिन सबसे क्रांतिकारी घोषणा तो उन्होंने अक्टूबर 1932 में की जब राज्य के सभी मंदिरों को दलितों के लिए खोल दिया , यह घोषणा गाँधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन से भी पहले हुई थी और शायद देश में पहली ऐसी कोशिश थी।

अपनी रियासत का भारत में बिना हिचक विलय करनेवाले जम्मू कश्मीर के अंतिम हिंदू महाराजा हरि सिंह जी को जयंती अवसर पर विनम्र अभिवादन

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