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गुप्त राजवंश द्वारा निर्मित राजमहल का गढ़

गुप्त राजवंश के काल को ‘भारत का स्वर्णिम युग’ कहा जाता है। यह वो समय था जब सोने के सिक्के सर्वाधिक प्रचलन में थे। इन्हें निष्क और द्रम्म कहा जाता था। ऐसा समुद्रगुप्त के समय था।


समुद्र गुप्त के काल (३४९ ईस्वी) में मन्दार पर्वत पर अवस्थित नरसिंह गुहा भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण विष्णुदत्त को दिया गया था। ये पंडित विष्णु शर्मा ( ‘पंचतंत्र’ के रचयिता) के पुत्र थे। इस गुहा में नरसिंह की प्रतिमा का निर्माण निश्चय ही इससे पहले हुआ था। इस गुफा का नाम ‘विराजो गुहा’ उल्लिखित है।


मंदार पर्वत से पूर्व दिशा में अवस्थित राजमहल की दूरी १०५ किलोमीटर है। मुगलों के काल में यह जगह बहुचर्चित थी। सन १७७२ में इसे राजस्व जिले का दर्जा भागलपुर के साथ ही मिला। इन दोनों जिलों के कलक्टर विलियम हारवूड नियुक्त किये गये थे। अब यह राजमहल झारखंड के साहेबगंज जिले में है। मुगलकाल में इसी संकीर्ण पैसेज से बंगाल में प्रवेश किया जाता था। वैसे, प्रवेश का दूसरा और चर्चित मार्ग उत्तरापथ था जिसे सड़क-ए-आज़म से लेकर ग्रैंडट्रंक रोड का सफर तय करना पड़ा है। 


राजमहल को गुप्त राजवंश के काल में ‘मंडलादुर्ग’ के नाम से जाना जाता था। इसका अधिकार दत्त वंश के योद्धाओं को था जिसे मंडल अधिपति कहा जाता था। दत्तवंश के तक्षदत्त के समय पहाड़ियों ने विद्रोह कर राजमहल पर अधिकार कर लिया था। बाद में गुप्त शासकों द्वारा इसे पुनः अपने आधिपत्य में लिया गया था।  गुप्त राजवंश के शासन में भी यह स्थान मंडलागढ़ के रूप में ख्यात रहा। इस बात का प्रमाण यहां के भवनों के निर्माण में लगाए गए स्तंभ भी देते हैं। 


गुप्त राजवंश के काल में विक्रमशिला से एक किलोमीटर उत्तर में स्थित गंगा के तट पर स्थित आज का वटेश्वर स्थान ‘वट गुहालि’ के नाम से ख्यात था। इसी वटगुहालि के समीप में ‘विक्रमपुरी’ ग्राम भी था जहां बुद्धाचार्य अनुपमसागर अभिषेकपर्व के अवसर पर महानाटक देखने गए थे। इसकी चर्चा तिब्बती लामा तारानाथ ने भी की है। यह ग्राम अब ‘ओरियप’ नाम से ज्ञात है जिसे शोध से मुंह चुरानेवाले लोग तिब्बती लोगों का गांव बताते हैं। इसके आसपास ६० -७०  के दशक में उत्खनन भी हुआ है।


यह भी संज्ञान में रखा जाना चाहिए कि राजमहल की सभी संरचनाएं ध्वंश अवशेष पर और उसकी लायक सामग्रियों को मिलाकर निर्मित की गई है जिससे इसे मुगलिया लुक मिला है। 

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