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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र मे भारत का योगदान:भाग 20

विशेष माहिती श्रृंखला : भाग 20 (20-30)

कुछ प्रमुख भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री

आर्यभट (476 ई.)

आर्यभट ने अपना विख्यात ग्रंथ ‘आर्यभटीय 499 ई. में, पटना के निकट कुसुमपुर में लिखा था। इस पुस्तक के गणित खंड में उनके द्वारा प्रस्तावित वर्ण अकीय प्रणाली (Alphabetic Numeral System), सरल एवं द्विघाती (Quadratic) समीकरणों तथा प्रथम डिग्री की अपरिमित समीकरणों को हल करने का वर्णन है । पुस्तक में त्रिकोणमिति फलनों ज्या (Sin) व शरज्या (Versine) का परिचय तथा ज्या की सारणी दी गयी है। इसमें प्राकृतिक संख्याओं उनके वर्गों तथा घनों का योग ज्ञात करने के नियम भी है। उन्होंने का मान 3.1416 दिया और यह भी स्पष्ट किया कि यह मान लगभग है।

आर्यभट भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने बताया कि पृथ्वी गोल है और इसकी अपनी धुरी पर घूमने के कारण दिन और रात होते हैं। चंद्रमा, सूर्य के प्रकाश से चमकता है और ग्रहण, पृथ्वी व चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं । इन महत्वपूर्ण योगदानों के कारण भारत के प्रथम उपग्रह का नाम, उनके नाम पर रखा गया है।

वराहमिहिर (490 ई.)

वराहमिहिर भी एक महान गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री थे । परंपरा के अनुसार, उनके नाम मिहिर के आगे वराह की उपाधि उज्जैन नरेश विक्रमादित्य द्वारा दी गयी थी क्योंकि उन्होंने सही मविष्यवाणी की थी कि राजा के पुत्र की 18 वर्ष की आयु में मृत्यु हो जायेगी। सूर्य सिद्धांत’ लिखे जाने के बाद से उस समय तक संचित त्रुटियों का समाधान करके उन्होंने भारतीय कैलेंडर को संशोधित किया। गणित में उनका मुख्य योगदान, त्रिकोणमिति के क्षेत्र में था। उनके मुख्य ग्रंथ है- पंच सिद्धांतिका, बृहत् संहिता तथा खगोल विज्ञान से संबंधित पुस्तक बृहत् जातक आर्यभट के साइन (Sine) सारणी के कार्य को उन्होंने आगे बढ़ाया।

ब्रह्मगुप्त (598 ई.)

उज्जैन नरेश के खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त ने ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत की रचना की थी जो पुरानी खगोलीय पुस्तक ‘ब्रह्मसिद्धांत का संशोधित एवं परिवर्धित रूप था। उनकी अन्य पुस्तक है- ‘कर्ण खंडखाद्यक । दोनों पुस्तकें मुख्यतः खगोलशास्त्र से संबंधित है परन्तु काफी भाग गणित को समर्पित है । यह अंकीय विश्लेषण (Numerical Analysis) के जनक कहे जा सकते हैं। उन्होंने बीजगणित तथा ज्यामिति में काफी मौलिक योगदान दिया था।

उनकी पुस्तक ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत के अरबी अनुवाद के माध्यम से पहले अरब और बाद में पश्चिमी देश, भारत के खगोलशास्त्र एवं गणित से परिचित हुये । महान गणितज्ञ भास्कर ने उन्हें गणक चक्र चूडामणि (Gem of the Circle of Mathematicians) उपाधि से विभूषित किया ।

महावीर (815 ई.)

यह जैन गणितज्ञ मैसूर शाखा से संबद्ध थे। मित्र, क्रमव्य समुच्चय, तथा समकोणीय त्रिभुजों के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है। “c का व्यापक (general) सूत्र देने का श्रेय उन्हें ही जाता है। अपने ग्रंथ ‘गणित सार संग्रह में उन्होंने अपने पूर्व के जैन गणितज्ञों के कार्यों का संकलन किया। साथ ही इसमें उन्होंने आर्यभट, भास्कर प्रथम तथा ब्रह्मगुप्त के कार्यों का सारांश भी सम्मिलित किया और कुछ क्षेत्रों में इन कार्यों का विस्तार भी किया।

श्रीधराचार्य (दसवी शताब्दी का उत्तरार्ध)

उनका कार्य अंकगणित मापन, ज्यामिति, वर्गमूल तथा घनमूल आदि क्षेत्रों में था। एक घर वाले द्विघाती समीकरण को हल करने वाले वे प्रथम व्यक्ति थे। समांतर तथा गुणोत्तर भेड़ियों पर उनका कार्य मानक संदर्भ बन गया था।

भास्कराचार्य (1114 ई.)

उज्जैन शाखा से संबंधित महान गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री भास्कराचार्य चक्रावल पद्धति द्वारा ब्रह्मगुप्त भास्कर समीकरण (द्वितीय आर्डर अपरिमित समीकरण) के हल तथा चक्रीय चतुर्भज पर अपने मौलिक पथ-प्रदर्शक कार्य के लिये विख्यात है। उन्होंने 36 वर्ष की आयु में सिद्धांत शिरोमणि की रचना की। इसमें अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति तथा खगोलशास्त्र से संबंधित चार अलग पुस्तकें हैं। उन्होंने पुस्तक के एक खंड का नाम अपनी विचवा बेटी लीलावती’ के नाम पर रख कर उसे भी अमर कर दिया। इस पुस्तक का दो बार फारसी में अनुवाद हो चुका है। उनकी अन्य पुस्तक का नाम ‘कर्ण कौतूहल है।

माधव (1340-1425)

माधव गणित की विख्यात केरल शाखा के संस्थापक थे। उनके ग्रंथों में देनावरोह तथा स्फुटचंद्रप्ति शामिल है। इसमें चंद्रमा की गति (Motion) जैसी अत्यंत जटिल समस्याओं के बारे में अत्यंत सरल हल (rule of thumb solution) दिये गये हैं। बाद के गणितज्ञों ने उन्हें ‘गोलाविद (Master of the Spherej की उपाधि दी । उनके मुख्य योगदानों में अनंत श्रेणी, वृत्तीय तथा त्रिकोणमिति फलनों के विस्तार तथा उनके परिमित श्रेणी सत्रिकटन (Finite series approximation) आदि शामिल हैं।

नीलकंठ सोमयाजी (1445-1545)

वह केरल गणित शाखा के प्रमुख स्तंभ थे । अपनी पुस्तक ‘आर्यभटीय भाष्य’ में उन्होंने आर्यभट के सूत्रों के निहितार्थों की व्याख्या की उनके सिद्धांतों का विवेचन किया तथा कई भ्रांतियों का निवारण किया । 1500 ई. में लिखा गया ‘तंत्र संग्रह’ उनका मुख्य ग्रंथ है ।

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