Opinion

अकाल व प्लेगपीड़ितों की सेवा ने ‘लोकमान्य ‘ बनाया तिलक को

तिलक ने प्लेग की बीमारी और भंयकर अकाल के दौरान देशवासियों की जो सेवा की, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता। पूना में उन्होंने समय से सस्ते अनाज की दुकानें खोलकर अकाल के कारण होने वाले दंगों को रोका। जब उन्होंने शोलापुर और अहमदनगर के लोगों के कष्टों के बारे में सुना तो वे स्वयं मौके पर गए और उन्होंने स्थानीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श करके एक योजना बनाई।

जैसे ही पूना में प्लेग के लक्षण प्रकट हुए उन्होंने ‘हिन्दू प्लेग अस्पताल‘ शुरू किया और कई दिनों तक इसके लिए धन जुटाने का कार्य किया। एक तरफ जहाँ पूना के अधिकांश नेता नगर छोड़कर भाग गए थे वहीं दूसरी तरफ तिलक वहीं जनसेवा में डटे रहे; उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया। वे खोजी दलों के साथ स्वयंसेवक के रूप में गए, अस्पताल का प्रबंध किया, पृथक्करण शिविर में नि:शुल्क रसोई की व्यवस्था की और जनता के सामने आ रही कठिनाइयों के बारे में श्री रेंड तथा महामहिम गवर्नर को बताते रहे।अपने समाचारपत्रों में उन्होंने प्लेग की समाप्ति के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न क़दमों का समर्थन दृढ़ता के साथ समर्थन किया।उन्होंने सलाह दी कि इन उपायों को सहानुभूतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण ढंग से लागू किया जाए। उन्होंने जनता को सलाह दी कि वह अनावश्यक विरोध न करे।
सन१८९६ में ‘बंबई प्रेसीडेंसी’ को भंयकर अकाल का सामना करना पड़ा। तिलक पूरी तरह राहत-कार्यों में जुट गए। उन्होंने अकाल- संहिता (फैमीन कोड) लागू करने का आग्रह ‘बंबई सरकार’ से किया। अकाल का प्रभाव कम करने के लिए उन्होंने सरकार को अनेक सुझाव भी दिए। अगर उन सुझावों को स्वीकार कर लिया जाता तो लोगों की तक़लीफ़ें काफ़ी कम हो जातीं। पूना में उन्होंने समय से सस्ते अनाज की दुकानें खोलकर अकाल के कारण होने वाले दंगों को रोका। जब उन्होंने शोलापुर और अहमदनगर के लोगों के कष्टों के बारे में सुना तो वे स्वयं मौके पर गए और उन्होंने स्थानीय नेताओं के साथ विचार-विमर्श करके एक योजना बनाई। इसके अंतर्गत स्थानीय समितियों को सरकार के साथ सहयोग करके इस वर्ग के लोगों को उपयुक्त राहत प्रदान करने को कहा गया।
यह योजना वैसी ही थी, जैसी उत्तर पश्चिम प्रांत के उपराज्यपाल ने स्वीकार की थी। दुर्भाग्यवश इस विषय पर बंबई सरकार के असहानुभूतिपूर्ण आचरण के कारण यह योजना स्वीकार नहीं की गई और यही नहीं, बंबई सरकार ने इस तरह की योजनाओं को मंज़ूरी देने की व्यवस्था में संशोधन कर दिया। सरकार की नाराज़गी का कारण यह था कि ‘पूना सार्वजनिक सभा’,(जिसके प्रमुख नेता तिलक थे) ने जनता को उन रियासतों से परिचित कराया था, जिसे क़ानून के अंतर्गत वे पाने के अधिकारी थे। इसके अलावा, सभा ने सरकार को अनेक प्रतिवेदन भेजे, लेकिन उनका या तो संक्षिप्त और रूखा जवाब मिला या कोई जवाब मिला ही नहीं, और अंतत: इस पर पूरे तौर पर पाबंदी लगा दी गई। यह सब अप्रत्यक्ष रूप से तिलक पर दबाव बनाने के लिए किया गया था, लेकिन वे निर्भर होकर अधिकाधिक कार्य करते रहे।
देशप्रेमियों के इस दल को शीघ्र ही अग्निपरीक्षा से होकर गुजरना पड़ा। ‘केसरी’ और ‘मराठा’ में प्रकाशित कुछ लेखों में कोल्हापुर के तत्कालीन महाराजा शिवाजीराव भोंसले के साथ किए गए व्यवहार की कठोर आलोचना की गई थी। राज्य के तत्कालीन प्रशासक माधवराव बर्वे (माधव बर्वे) ने इस पर ‘मराठा’ और ‘केसरी’ के संपादक के रूप में क्रमश: तिलक और आगरकर के विरुद्ध मानहानि का मुक़दमा चला दिया। कुछ समय बाद इन लोगों की कठिनाइयाँ और बढ़ गईं क्योंकि जब यह मामला विचाराधीन था, तभी ‘ वी.के. चिपलूनकर’ का देहांत हो गया। मुकदमे में ‘तिलक’ और ‘आगरकर’ को दोषी ठहराया गया। उन्हें चार-चार महीने की साधारण क़ैद की सज़ा सुना दी गई।
कोल्हापुर संबंधी मुक़दमे से स्कूल और दोनों समाचारपत्रों की लोकप्रियता में और वृद्धि हुई। लोगों ने स्वेच्छा से दान देना शुरू किया ।चिपलूनकर की मृत्यु के बाद तिलक काफ़ी समय तक इस छोटे दल के मार्गदर्शक और नामजोशी सक्रिय सदस्य रहे। सन् १८८४ के उत्तरार्ध में उन्होंने स्वयं को क़ानूनी अस्तित्व देने का निश्चय किया। उन्होंने इस उद्देश्य के लिए ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’, पूना का गठन किया और वे इस सोसाइटी के पहले आजीवन सदस्य बने। शीघ्र ही ‘प्रोफेसर वी.वी. केलकर’, ‘प्रोफेसर धारप ‘ और ‘प्रोफेसर एम.एस. गोळे ‘ , ‘प्रोफेसर गोखले’, ‘प्रोफेसर चिंतामणी गणेश भानू’ और ‘प्रोफेसर पाटणकर’ भी आजीवन सदस्य के रूप में जुड़ गए।
सन १८८५ ई. में ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के तत्वावधान में ‘फर्ग्युसन कॉलेज’ की स्थापना की गई और सभी आजीवन सदस्यों ने इस कॉलेज में २० वर्ष तक प्राध्यापक के रूप में काम करने की स्वीकृति दी। सोसाइटी की संस्थाऐं शीघ्र ही समृद्ध हो गईं। उन्होंने ‘गद्रेवाड़ा’ और ‘कबूतरखाना खेल का मैदान’ ख़रीद लिया। सर जेम्स फ़र्गुसन की सरकार के वायदे के अनुसार बाद में लॉर्ड रे ने सोसाइटी को नानावाड़ा सौंप दिया। सोसाइटी ने ‘चतुरश्रृंगी’ के समीप महाविद्यालय के लिए एक भव्य इमारत का निर्माण किया।

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