Opinion

वे पन्द्रह दिन…/09 अगस्त,1947

दिल्ली में, मंदिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा भवन में सुबह से ही हलचल थी. महासभा के अध्यक्ष डॉक्टर ना.भा. खरे कल ही ग्वालियर से दिल्ली पहुंचे थे.

डॉक्टर खरे एक जबरदस्त व्यक्तित्व थे. खरे साहब वैसे तो मूलतः काँग्रेस के थे. 1937 में, मध्य भारत प्रांत के वे पहले काँग्रेसी मुख्यमंत्री थे. लेकिन डॉक्टर खरे, लोकमान्य तिलक की परंपरा से तैयार हुए ‘गरम दल’ गुट के थे. उन्हें काँग्रेस द्वारा सतत मुस्लिम लीग का तुष्टिकरण करना पसंद नहीं था. इसीलिए जब वे इस सन्दर्भ में सार्वजनिक रूप से अपने विचार रखते थे तो नेहरू और गांधी जी को यह कतई पसंद नहीं आता था. ऐसे में गांधी जी ने डॉक्टर खरे को सेवाग्राम के आश्रम में बुलाया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का आदेश दिया.

यह सुनकर डॉक्टर खरे ने एकदम सहज रूप से गांधी जी से कहा कि, “मेरी वर्तमान मनःस्थिति ठीक नहीं है, इसलिए इस्तीफे का मसौदा आप ही लिख दीजिए”. डॉक्टर खरे इतनी सरलता से त्यागपत्र देने को राजी हो गए, यह सुनकर गांधी जी आनंदित हो गए और तत्काल उन्होंने एक कागज़ पर अपने हाथों से, अपनी हस्तलिपि, में डॉक्टर खरे का इस्तीफ़ा लिख दिया. वह कागज़ लेकर डॉक्टर खरे शान्ति से उठे, उस पर हस्ताक्षर नहीं किए… और अपनी कार से नागपुर जाने के लिए निकल पड़े. यह देखकर गांधी जी चौंक गए और उनके पीछे से चिल्लाने लगे, “अरे, ये क्या करता है…? कहां जाता है..?”

डॉक्टर खरे वह पत्र लेकर नागपुर आए. गांधी जी के हाथों से लिखा हुआ वह त्यागपत्र उन्होंने नागपुर के सभी अखबारों में प्रकाशित करवा दिया और जनता के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘स्वयं गांधी जी किस प्रकार एक मुख्यमंत्री पर दबाव डालकर मुझसे इस्तीफ़ा ले रहे हैं’.

तो, ऐसे चतुर डॉक्टर ना.भा. खरे, आजकल हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनकी सहायता करने के लिए पंडित मौलीचंद्र शर्मा जैसा जबरदस्त व्यक्तित्व भी है. पंडित शर्मा की पृष्ठभूमि भी काँग्रेसी ही है. 1930 और 1931 में लन्दन की गोलमेज कांफ्रेंस में उन्होंने काँग्रेस का प्रतिनिधित्व किया था. परन्तु वे भी काँग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण किए जाने के कारण हिन्दू महासभा के निकट आए. आज तो साक्षात तात्याराव सावरकर हिन्दू महासभा भवन में उपस्थित होने जा रहे थे, इसलिए आज सभी के चेहरे प्रसन्नता से एकदम खिले हुए थे.

सुबह नाश्ता करके ठीक नौ बजे हिन्दू महासभा के केन्द्रीय समिति की बैठक आरम्भ हुई. बैठक में हिन्दू महासभा द्वारा घोषित मुद्दों पर चर्चा शुरू की गई. ‘खंडित हिन्दुस्तान में सभी नागरिकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे, लेकिन प्रस्तावित पाकिस्तान में हिंदुओं की जो और जैसी स्थिति रहेगी, ठीक वैसी ही स्थिति खंडित हिन्दुस्तान में बचे हुए मुसलमानों की रहे’, यह मांग उठाने का तय हुआ. हिन्दी भाषी प्रान्तों में देवनागरी लिपि में हिंदी भाषा में समस्त प्रशासनिक कार्यवाही होगी. अन्य प्रान्तों में भले ही पढ़ाई का माध्यम स्थानीय भाषाओं और लिपी में हो, परन्तु फिर भी राष्ट्रभाषा हिन्दी को ही प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था में मान्य किया जाए. इसके अलावा ‘अनिवार्य रूप से सभी नागरिकों के लिए सैन्य प्रशिक्षण’ सहित अनेक मांगें हिन्दू महासभा की इस बैठक में रखी गईं.

कम से कम खंडित हिन्दुस्तान में तो हिन्दू अपने पूर्ण अभिमान और गर्व के साथ सिर ऊंचा करके रह सके, इसी उद्देश्य से ये सारे नेता भिन्न-भिन्न दिशाओं से प्रयास कर रहे थे.

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रामलीला मैदान पर जबरदस्त भीड़ एकत्रित हुई है. स्वतंत्रता सप्ताह आज से आरम्भ होने जा रहा है. आज शनिवार है और अब अगले शुक्रवार को हम एक स्वतन्त्र राष्ट्र बनने जा रहे हैं. काँग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं के आज होने वाले भाषण, यह एक बड़ा आकर्षण हैं. इस सभा में नेहरू, पटेल जैसे बड़े नेता बोलने वाले हैं. यह कार्यक्रम दिल्ली प्रदेश काँग्रेस कमेटी ने आयोजित किया है. इस कारण शुरुआत में दिल्ली प्रांत के स्थानीय नेताओं ने बोलना शुरू किया. परन्तु जैसे ही सभास्थल पर नेहरू और पटेल का आगमन हुआ, भीड़ का माहौल एकदम बदल गया. सभी में उत्साह का संचार हो गया. लोग जोरशोर से स्वतःस्फूर्त नारे लगाने लगे.

जब सरदार पटेल बोल रहे थे, तब सम्पूर्ण रामलीला मैदान शान्ति से उन्हें सुन रहा था. पटेल ने विभाजन की विवशता लोगों को समझाने का प्रयास किया. परन्तु जनता को उनके तर्क ना तो पसंद आ रहे थे और ना ही गले उतर रहे थे. इसलिए पटेल के भाषण को अधिक उत्साही प्रतिक्रिया नहीं मिली. लगभग ऐसा ही नेहरू के भाषण के बाद भी हुआ. भीड़ निरुत्साहित सी लगने लगी.

दिल्ली इस समय विस्थापितों की राजधानी बन चुकी है. बड़े पैमाने पर घरबार, मकान-दुकान, संपत्ति खोकर लुटे-पिटे हिन्दू शरणार्थी दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. वे नेहरू-पटेल के मुंह से कोई ठोस बात सुनना चाहते थे. परन्तु वैसा नहीं हुआ. नेहरू अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर बोलते रहे. उन्होंने गर्जना की, कि ‘अब सम्पूर्ण एशिया से विदेशी शक्तियों को पूरी तरह खदेड़ दिया जाएगा’. परन्तु मैदान में एकत्रित जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

स्वतंत्रता सप्ताह के पहले ही दिन, सभा की शुरुआत में जैसा उत्साह और प्रसन्नता दिखाई दे रही थी, वैसी सभा के अंत होते-होते दिखाई नहीं दी…!

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देश के मध्य में स्थित नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महाल कार्यालय में शनिवार की रात को संघ के वरिष्ठ प्रचारक और पदाधिकारी बैठे हैं. उनके सामने अखंड भारत का नक्शा रखा हुआ है. इस विभाजन की एकदम सटीक रेखा कौन सी हो सकती है, तथा उस विभाजन रेखा के उस पार, बचे हुए हिन्दू-सिखों को कैसे बचाया जा सकता है, इस पर गहन मंथन चल रहा है…!

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