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कृष्णभक्ति की रसधार बहाने वाला अलौकिक संत

हिंदी साहित्य के ‘स्वर्णयुग’ व ‘लोक जागरण काल’ माने जाने वाले मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन ने कबीर, तुलसी व सूरदास जैसे एक से एक अनमोल रत्न भारतभूमि को दिये हैं; किन्तु आज की युवा पीढ़ी इन लोकप्रिय भक्त कवियों को गढ़ने वाले महान आचार्यों के जीवन व उनके योगदान से प्रायः अनभिज्ञ है। जिस तरह भक्ति आन्दोलन के महानतम संत रामानंदाचार्य राम भक्ति काव्यधारा के प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं, ठीक वैसे ही कृष्ण भक्ति काव्यधारा का सूत्रपात करने का श्रेय महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को जाता है। आज वैशाख कृष्ण एकादशी (वरूथिनी एकादशी) को वल्लभाचार्य जी का 543वां जयंती पर्व है। इस पुण्य अवसर पर प्रस्तुत हैं अलौकिक कृष्ण भक्त महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के जन्म, जीवन व उनके पुष्टिमार्गीय दर्शन से जुड़ी कुछ अद्भुत, रोचक व शिक्षाप्रद जानकारियां –

महान कृष्ण भक्त का अद्भुत जन्म
वि.सं. 1535 (सन् 1479) को बैसाख कृष्ण एकादशी के दिन रायपुर जिले में स्थित महातीर्थ राजिम के पास चम्पारण्य (वर्तमान चम्पारण) में वल्लभाचार्य का जन्म हुआ। कथानक है कि आंध्र प्रदेश के गोदावरी तट पर बसे कांकरवाड ग्राम के मूल निवासी दक्षिण भारतीय भारद्वाज गोत्र के समृद्ध तैलंग ब्राह्मण लक्ष्मण भट्ट अपनी पत्नी इल्लामगारू के साथ काशी की यात्रा पर निकले थे। रास्ते में मध्य प्रदेश के चम्पारण्य ( वर्तमान चम्पारण) में उनकी पत्नी को प्रसव वेदना हुई तो वे रात्रि में उस वन में रुक गये। वहां वैशाख कृष्ण एकादशी की तिथि को उन्होंने आठ माह के बालक को जन्म दिया किन्तु बालक को चेष्टाविहीन देख माता-पिता देवेच्छा मान कर दुखी मन से उसे सफेद कपड़े में लपेटकर शमीवृक्ष की कोटर में रख वहां से चल दिये। अगले दिन काशी जाते समय जब वे लोग पुन: उसी वन से होकर गुजरे तो देखा कि उसी शमी वृक्ष के पास एक सुन्दर बालक अग्नि के घेरे में सकुशल खेल रहा है। कहते हैं कि अपने शिशु की वह मोहनी छवि देख वात्सल्य अभिभूत मां के स्तनों में तत्क्षण दूध उतर आया और उसने अग्नि के उस घेरे में प्रवेश कर उस अपने शिशु को गोद में उठा लिया। यही बालक भविष्य में महान कृष्ण भक्त व पुष्टिमार्ग के प्रणेता वल्लभाचार्य नाम से लोकविख्यात हुआ। कहा जाता है कि उस बालक को लेकर माता-पिता काशी में आकर बस गये। पांच वर्ष की अवस्था में उनकी शिक्षा-दीक्षा पं. नारायण भट्ट व माधवेंद्रपुरी के सान्निध्य में काशी में प्रारंभ हुई थी। रुद्रसंप्रदाय के श्री विल्वमंगलाचार्य ने उन्हें ” गोपाल मन्त्र” की दीक्षा दी। वे आरंभ से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेद, वेदांग, दर्शन, पुराण, काव्यादि तथा वैष्णव धर्म के अतिरिक्त जैन, बौद्ध, शैव, शाक्त, शांकर आदि विविध धर्म-संप्रदायों के धार्मिक ग्रंथों में अभूतपूर्व निपुणता प्राप्त की थी।

वल्लभाचार्य का पुष्टिमार्ग

महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का अवतरण ऐसे समय में हुआ था जब विदेशी आक्रान्ताओं के चतुर्दिक आक्रमणों से भारतीय समाज में परस्पर संघर्ष, अविश्वास और ईश्वर के प्रति अनास्था, अशांति और निराशा फैली हुई थी। ऐसे संक्रमण काल में वल्लभाचार्य ने अपने सरल सर्वग्राह्य ज्ञानोपदेश से दिग्भ्रमित राष्ट्रवासियों को जीने की नयी राह दिखायी। महाप्रभु श्रीवल्‍लभाचार्य जी ने प्रतिपादित किया कि सच्चिदानन्द प्रभु श्रीकृष्ण ही एकमात्र परब्रह्म हैं जो सर्वव्यापक और अंतर्यामी हैं । “सर्वात्मना सर्वभावेन” भाव से समर्पण कर उनकी शरण में रहने वाले मानव का कभी अहित नहीं हो सकता। वल्लभाचार्य जी अनुसार सृष्टि के तीन मूल तत्व हैं- ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा। अर्थात ईश्वर, जगत और जीव। उक्त तीन तत्वों को केंद्र रखकर ही उन्होंने ‘’शुद्धाद्वैतवाद ‘’ दर्शन के आधार पर जगत और जीव की अभिनव व्याख्या की। आचार्य वल्लभ की मान्यता थी कि लीलापुरुष श्रीकृष्ण ही पुरुषोत्तम हैं। समूचा जड़ -चेतन संसार उन्हीं के क्रीड़ाभाव के कारण आविर्भाव और तिरोभाव के बीच उबरता-डूबता रहता है। उत्पत्ति, स्थिति और लय इसके तीन रूप हैं। वल्लभाचार्य जी ने अपने इस सिद्धांत को पुष्टि मार्ग कहा। पुष्टि यानी प्रभु का अनुग्रह या पोषण। उन्होंने कहा कि जीव तीन प्रकार के होते हैं- पहला “पुष्टि जीव” जो कृष्ण के अनुग्रह पर भरोसा करता है दूसरा “मर्यादा जीव” जो शास्त्र के अनुसार जीवन जीता है और तीसरा “संसारी जीव” जो संसार के प्रवाह में फंसा रहता है। श्री वल्लभ का सिद्धान्त है कि सत्य तत्व का कभी विनाश नहीं हो सकता। चूंकि जगत भी ब्रह्मरूप है, इसलिए उसका कभी विनाश नहीं हो सकता, उसका केवल अविर्भाव और तिरोभाव होता है। आचार्य वल्लभ के पुष्टिमार्ग के अनुसार ईश्वर सेवा दो प्रकार से होती है – 1.नाम सेवा और 2.स्‍वरूप सेवा। इसमें भी स्‍वरूप सेवा तीन प्रकार की होती है – तनुजा (तन यानी शरीर से) , वित्तजा (वित्त यानी धन से) और मानसी (मन यानी आचरण से)।

मानसी सेवा के भी दो रूप हैं – मर्यादा-मार्गीय और पुष्टि मार्गीय। मर्यादा-मार्गीय मानसी-सेवा पद्धति का आचरण करने वाला साधक जहां अपनी लोभ और अहं को गला कर अपने इष्ट को प्राप्त कर लेता है, वहीं पुष्टि-मार्गीय मानसी-सेवा पद्धति वाला साधक अपने शुद्ध प्रेम के द्वारा श्रीकृष्‍ण भक्ति में लीन हो जाता है और उनके अनुग्रह से सहज में ही अपनी वांछित वस्‍तु प्राप्‍त कर लेता है।

श्रीनाथ जी की पूजा करने वाले प्रथम संत
पुष्टिमार्ग के प्रणेता आचार्य वल्लभ ने अपने सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिये पूरे भारत की तीन बार पदयात्रा कर विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। कहा जाता है कि उनकी ये यात्राएं लगभग उन्नीस वर्षो में पूरी हुईं। अपनी इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्होंने मथुरा, गोवर्धन आदि स्थानों में श्रीनाथजी की पूजा की विशेष व्यवस्था की। वल्ल्भाचार्य जी द्वारा श्रीनाथ जी की पूजा का वाकया भी बेहद रोचक है। एक बार वल्ल्भाचार्य जी ने देखा कि एक गाय पहाड़ों के एक निश्चित स्थल पर प्रतिदिन दूध देती है। वल्लभाचार्य उस स्थान पर उस दृश्य को देखने रोज वहां जाने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्यों गऊ माता प्रतिदिन इसी स्थान पर दूध देने लगती हैं। कौतुहलवश उन्होंने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां उन्हें श्रीनाथ (भगवन श्री कृष्ण ) जी की प्रतिमूर्ति प्राप्त हुई। श्रीनाथ जी की पूजा करने वाले प्रथम संत माने जाते हैं।

आचार्य वल्लभ न होते तो सूर भी नहीं
कहते हैं कि एक बार भगवद्भक्ति के प्रचार के दौरान वल्लभाचार्य जब वृंदावन की ओर आ रहे थे तभी रास्ते में उन्हें एक रोता बिलखता व्यक्ति दिखा। पूछा, रिरिया क्यों रहे हो तुम? कृष्ण लीला का गायन क्यों नहीं करते? सूरदास बोले- मैं अंधा क्या जानूं लीला क्या होती है? यह सुनकर वल्लभ ने सूरदास के मस्तक पर अपना हाथ रख दिया। कहते हैं कि उनके इस दिव्य स्पर्श से श्रीकृष्ण की सभी बाललीलाएं सूरदास की बंद आंखों के सामने तैर गयीं। महाप्रभु वल्लभ उन्हें वृंदावन ले लाए और श्रीनाथ मंदिर में होने वाली आरती के क्षणों में हर दिन एक नया पद रचकर गाने का सुझाव दिया। इन्हीं सूरदास के हजारों पद “सूरसागर” में संग्रहीत हैं। इन पदों का रस आज भी श्रीकृष्ण भक्तों के बीच प्रेम की निर्मल काव्यधारा के रूप में प्रवाहित हो रहा है।

सौजन्य : पाञ्चजन्य

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