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स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका

भारत की स्वतंत्रता की कहानी हम सभी को ज्ञात है. गांधीजी का सत्याग्रह, भगत सिंह का बलिदान, सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज, असंख्य क्रांतिकारियों का संघर्ष और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन… इन सबने मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी. भारत की स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी. यह उस सभ्यता की पुकार थी जिसने सदियों की पराधीनता के पश्चात् भी अपनी राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा.

मुगल आक्रमणों से लेकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद तक, भारत की आत्मा ने कभी पराधीनता को अपना भाग्य स्वीकार नहीं किया.1857 से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों तक, असहयोग से लेकर सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन तक, असंख्य भारतीयों ने एक ही स्वप्न देखा था – स्वतंत्र भारत.

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जो अंग्रेजी शासन के विरोध में सक्रिय रहे थे, भी उन असंख्य भारतीयों में एक थे जिन्होंने भी यह स्वप्न देखा था और इसी ध्येय के साथ 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की.

बचपन से ही डॉ. हेडगेवार के मन में मातृभूमि के प्रति प्रखर प्रेम और विदेशी शासन के प्रति तीव्र असंतोष था। 22 जून 1897 को जब ब्रिटिश भारत के विद्यालयों में महारानी विक्टोरिया के शासन के 60 वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाया जा रहा था और मिठाइयाँ बाँटी जा रही थीं, तब बाल हेडगेवार ने उन मिठाइयों को गुस्से में फेंक दिया। पूछे जाने पर उन्होंने कहा – विदेशी शासक जिसने मेरे देश को गुलाम बना लिया हो उनके शासन का उत्सव हम कैसे मना सकते हैं? बाल्यावस्था की यह घटना उनके राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की प्रबल भावना की प्रारंभिक अभिव्यक्ति थी.

वे कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन से जुड़े रहे और 1920-21 के असहयोग आंदोलन में भाग लिया और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में कारावास दिया.

सायमन कमीशन के विरोध में नागपूर और मध्य प्रान्त में यह आंदोलन खड़ा हुआ और डॉ हेडगेवार, इस कमीशन के विरोध हेतु बनाए गए समिती के प्रमुख थे.

लेकिन डॉ. हेडगेवार केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने की चिंता नहीं कर रहे थे. उनका उससे बड़ा प्रश्न था – “भारत बार-बार विदेशी शक्तियों का शिकार क्यों बना?” “अंग्रेज चले जाएंगे, लेकिन क्या भारत फिर कभी पराधीन नहीं होगा?”

उनका उत्तर था – जब तक समाज संगठित, चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ नहीं होगा, तब तक केवल सत्ता परिवर्तन भारत को स्थायी शक्ति नहीं दे सकता. और समाज को मजबूत करने के लिए चाहिए – चरित्रवान व्यक्ति.

डॉ. हेडगेवार का संपर्क स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं से रहा. आरएसएस की अपनी वैचारिक सामग्री में लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, विनायक दामोदर सावरकर, सुभाषचंद्र बोस तथा भगत सिंह के साथियों और क्रांतिकारी धारा से उनके संपर्कों का उल्लेख मिलता है. 1929 में डॉ. हेडगेवार का संपर्क महान क्रांतिकारी सुखदेव से हुआ और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए वो सभी सहयोग दिया जिनकी उन्हें आवश्यकता थी.

26 जनवरी 1930 – स्वतंत्रता का संकल्प

1929 के लाहौर अधिवेशन के बाद पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में आया. 26 जनवरी 1930 को देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाने का आह्वान हुआ. संघ की शाखाओं में भारत का तत्कालीन ध्वज फहराया गया। कांग्रेस द्वारा इस कार्य पर अभिनन्दन भी किया गया.

उसी वर्ष डॉ. हेडगेवार स्वयं “सविनय अवज्ञा आंदोलन” में उतरे और 12 सवयंसेवको के साथ उनको कारावास भोगना पड़ा. यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था. यह संदेश था – अंग्रेजी सत्ता अस्थायी है. भारत की स्वतंत्रता ही अंतिम लक्ष्य है.

डॉ. हेडगेवार जानते थे कि आंदोलन आएंगे और चले जाएंगे, लेकिन राष्ट्र को स्थायी शक्ति देने के लिए एक अनुशासित समाज चाहिए.

यही कारण था कि उन्होंने स्वयं जेल जाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया कि संघ का संगठनात्मक कार्य रुके नहीं. उनकी अनुपस्थिति में डॉ. लक्ष्मणराव परांजपे को संघ कार्य की जिम्मेदारी दी गई. अर्थात संघर्ष भी जारी रहा और राष्ट्रनिर्माण की तैयारी भी.

देश की पुकार जहाँ पहुँची, स्वयंसेवक वहाँ खड़ा मिला

एक वाक्या 1936 में महाराष्ट्र के फैजपुर में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान हुआ. पं जवाहरलाल नेहरू द्वारा तिरंगा फहराए जाने के दौरान ध्वज ऊपर जाकर उलझ गया. जब कोई आगे नहीं आया, तब एक युवक खंभे पर चढ़ा, रस्सी खोली और ध्वज को ठीक किया. वह और कोई नहीं बल्कि आरएसएस के स्वयंसेवक किशनसिंह राजपूत थे. इस घटना का महत्व केवल व्यक्ति के साहस में नहीं, बल्कि उस भाव में है जिसमें संकट के क्षण में यह नहीं सोचता कि वह किस संगठन से जुड़ा है, वह केवल आगे बढ़ता है क्योंकि राष्ट्रध्वज का सम्मान उसके लिए सर्वोपरि है.

1942: जब भारत ने कहा… अंग्रेजों, भारत छोड़ो

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे निर्णायक चरणों में से एक था. इस आंदोलन ने पूरे देश को झकझोर दिया. नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं. ब्रिटिश दमन शुरू हुआ. हजारों भारतीय सड़कों पर उतरे. यह स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक जनविद्रोह बन गया.

आरएसएस के अनेक स्वयंसेवकों ने व्यक्तिगत रूप से आंदोलन में भाग लिया. महाराष्ट्र के रामटेक में “चले जाओ आंदोलन” में आंदोलनकारियों ने तहसील कार्यालय पर तिरंगा फहरा दिया. अंग्रेज़ों ने आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया और संघ के कार्यकर्ता उमाकांत केशव (बालासाहेब देशपांडे) को फांसी की सजा सुनाई. बाद में जनता के आंदोलन के दबाव में यह सजा निरस्त हुई

चिमुर जि.चंद्रपुर में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन बेहद उग्र हुआ, अंग्रेज़ की गोलियों से पांच लोग वीरगती को प्राप्त हुए और लगभग 200 से अधिक लोगों पर मुकदमा चलाया गया, जिनमें से 21 को फांसी और 26 को कालेपानी की सजा सुनाई गई.

महात्मा गांधी की गिरफ़्तारी के ठीक एक महीने बाद, 9 सितंबर 1942 को नंदुरबार (महाराष्ट्र) में एक विरोध जुलूस निकाला गया. स्कूली बच्चों की अगुवाई में यह जुलूस ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाते हुए सड़कों से गुज़रा. जब यह समूह स्थानीय सरकारी दफ़्तर के पास पहुँचा, तो अंग्रेजी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से राष्ट्रीय ध्वज छीनने की कोशिश की. इस के दौरान हिंसा बढ़ गई और बाद में हुई गोलीबारी में युवा स्वयंसेवक शशीधर केतकर वीरगति को प्राप्त हुए.

स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक संगठन या एक विचारधारा की संपत्ति नहीं थी… वह करोड़ों भारतीयों का साझा स्वप्न थी. और इस स्वप्न में स्वयंसेवकों ने भाग लिया… उन्होंने जेलें देखीं… उन्होंने दमन सहा… और कुछ ने अपने प्राण भी दिए.

स्वतंत्रता की लड़ाई में सहयोग की एक दूसरी धारा..

भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों के दौरान विभिन्न विचारधाराओं के लोग एक-दूसरे की सहायता करते थे। संघ से जुड़े स्वयंसेवकों द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों को आश्रय, संपर्क या अन्य प्रकार की सहायता दिए जाने के अनेक संस्मरण उपलब्ध हैं।

अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण, साने गुरुजी और क्रांतिसिंह नाना पाटील जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नामों के साथ दिल्ली के तत्कालीन प्रांत संघचालक लाला हंसराज गुप्ता, सातारा में देशमुख जी, औंध के संघचालक पंडित सातवलेकर द्वारा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से मदद किये जाने के प्रसंग व्याप्त हैं.

क्रम यहां नहीं रुका, 1938 में हैदराबाद मुक्ति संग्राम का आंदोलन तेज होता गया, और 2 हजार स्वयंसेवकों के साथ भैयाजी दानी की अगुआई में 1946 में वारंगल किले पर तिरंगा फहराया गया.

1947 के बाद भी अधूरी थी राष्ट्र की एकता

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन देश के कुछ हिस्से अभी भी विदेशी शासन के अधीन थे. और इन हिस्सों की मुक्ति के आंदोलनों में संघ से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। 1954 के दादरा व नगर हवेली मुक्ति संग्राम में राजाभाऊ वाकणकर, सुधीर फडके (बाबूजी), बिंदूमाधव जोशी, व शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे ने इन संघर्षों में भाग लिया. वहीं, गोवा मुक्ती संग्राम, 1955 में जगन्नाथराव जोशी, राजाभाऊ महाकाल, मोहन रानडे, राष्ट्र सेविका समिती द्वितीय प्रमुख संचालिका सरस्वतीबाई आपटे ने पुर्तगाली शासन का विरोध किया.

एक शताब्दी की यात्रा: संघर्ष से निर्माण तक

1925 में नागपुर से प्रारंभ हुई संघ की यात्रा आज एक शताब्दी पूरी कर चुकी है. इस यात्रा को केवल राजनीतिक घटनाओं से समझना संभव नहीं है. यह एक ऐसे संगठन की कहानी भी है जिसने अपने कार्य का केंद्र व्यक्ति और समाज को बनाया.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान डॉ. हेडगेवार का जेल जाना, 1930 का सत्याग्रह, 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज्य दिवस मनाना, 1942 के आंदोलन में स्वयंसेवकों की भागीदारी और बलिदान, तथा स्वतंत्रता के बाद दादरा-नगर हवेली और गोवा की मुक्ति में स्वयंसेवकों की भूमिका, ये सभी प्रसंग उस व्यापक राष्ट्रवादी भावना की अलग-अलग कड़ियाँ हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में जिन स्वयंसेवकों ने अपना जीवन अर्पित किया, उनके भारत की संकल्पना एक स्वतंत्र, सम्प्रभुसत्तात्मक, व आत्मनिर्भर देश हो. आज की पीढ़ी के सामने उसी भारत को सशक्त, समृद्ध, संगठित और विश्व में गौरव के साथ खड़ा करने की आह्वान है.

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